अवधी काव्य के शिखर साहित्यकार, चन्द्र भूषण त्रिवेदी उर्फ़ ‘रमई काका’

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अवधी के शिखर साहित्यकार, चन्द्र भूषण त्रिवेदी उर्फ़ ‘रमई काका’ सही मायनों में जनकवि है जिन्होंने काग़ज़ रूपी धरती पर अक्षरों को बोकर मुस्कान और हास्य की ऐसी फसल तैयार की थी वह आज तक पाठकों को गुदगुदाती रहती है ।

रेडियो की नौकरी करते हुए लंबा समय लखनऊ जैसे बड़े शहर मे बिताने के बावजूद उनके भीतर से गाँव कभी नहीं निकला और शायद यही वजह है कि खुद को बड़ा कवि मानने की बजाय कविता की खेती करने वाला किसान मानना उन्हे हमेशा रास आता रहा।

चाहे रेडियो हो या टेलीविजन या फिर कवि सम्मेलनों का मंच रमई काका कभी खुद को शहरी बाबू दिखाने के बजाय गांव का अनुभव बूढ़ा महसूस करना ज्यादा बेहतर समझा और शायद यही वजह है कि आकाशवाणी में उनका बहरे बाबा नाम से नाटक इतना प्रचलित था कि गांव में नियत समय पर लोग उसके इंतजार में रेडियो खोल कर बैठ जाते थे उसकी लोकप्रियता की यह हालत थी यह अकेला नाटक लगातार 25 सालों तक रेडियो पर घूमता रहा और लोग बहरे बाबा द्वारा कही गई बात का दूसरा दूसरा मतलब निकालने निकालने और उससे पैदा होने वाली खिलखिला हट में डूबते रहे

ग्रामीण परिवेश और गांव की आम जिंदगी से इतने करीब से जुड़े रहने की वजह शायद यह है कि रमई काका का बचपन काफी किल्लत में गुजरा था क्योंकि उनकी मां को फौजी पति के प्रथम विश्वयुद्ध में शहीद होने के बाद कुल ₹300 की जो पेंशन मिलती थी उसी में पूरे घर का खर्चा चलता था उन्होंने आप का जन्म 2 फ़रवरी सन्1915 में जनपद उन्नाव के रावतपुर नामक गाँव में हुआ था । आप के पिता वृन्दावन त्रिवेदी फ़ौज में नौकरी करते थे , और प्रथम विश्व युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे । उस स

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के रहने वाले रमई काका ने हाई स्कूल की परीक्षा अटल बिहारी स्कूल से पास की और नियोजन विभाग में निरीक्षक के पद पर भर्ती हो गए। निरीक्षक पद प्रशिक्षण लेने के बाद वे कुछ समय के लिए वे मसौदा फ़ैज़ाबाद में रहे अपने प्रशिक्षण कार्य काल में अपनी प्रतिभा से प्रशिक्षकों को प्रभावित किया था । यहाँ उन्होंने कई कविताएँ लिखी और कई एकांकियों का मंचन भी किया। ‘गड़बड़ स्कूल ‘ एकांकी ने यहाँ के लोगों का बहुत मनोरंजन किया था । यहाँ के बाद उनकी नियुक्ति उन्नाव के बोधापुर केंद्र में हो गई । यहाँ आप ने बहुत ही मेहनत के साथ काम किया फलतः आपके केंद्र को सम्पूर्ण लखनऊ कमिश्नरी में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ । उन्हें गवर्नर की’सर हेनरी हेग शील्ड ‘ प्रदान की गई । इस केन्द्र पर काम करते समय काका ने एक बैलगाड़ी भी बनायी जिसमें बॉल बियरिंग का प्रयोग हुआ था , जिसमें ढलान से उतरते समय उसमें ब्रेक का भी प्रयोग किया गया था । यद्यपि आपने सुगम और शास्त्रीय संगीत की शिक्षा नहीं प्राप्त किया था , परन्तु अपनी योग्यता के बल पर ही आपने शास्त्रीय और सुगम संगीत का ज्ञान प्राप्त किया । सत्ताइस वर्ष की उम्र में सन्1941 में काकाजी की नियुक्ति लखनऊ आकाशवाणी में हो गई । आकाश वाणी में काका 62 वर्ष की उम्र तक ही रहे । और 1977 वहाँ से वे सेवानिवृत्त हुए । परन्तु इसके दो वर्षों के बाद आप का सेवाकाल दो दो वर्षों के लिए बढ़ाया भी गया । सेवानिवृत्त होने के बाद भी वे कभी निष्क्रिय नहीं हुए ,तथा समाचार पत्रों , पत्रिकाओं, दूरदर्शन, तथा कवि सम्मेलनों से जुड़े रहे , आकाश वाणी पर आपने अनेक भूमिकाओं का निर्वहन किया , ‘ सत्तू दादा’,’चतुरी चाचा’, ‘बहिरे बाबा’आदि उनकी भूमिकाएँ थीं । रमई काका के अलावा आपको बहिरे बाबा के नाम से भी बहुत अधिक ख्याति मिली । ‘बहिरे बाबा ‘ नामक धारावाहिक ने तो प्रसारण का कीर्तिमान स्थापित कर दिया था । यह प्रसारण पच्चीस से अधिक सालों तक आकाश वाणी से प्रसारित हुआ था ।

रमई काका की पहली उपलब्ध कविता, उन्होंने पढरी के स्कूल में पढ़ते समय लिखी थी । इस कविता पर अपने गुरु पंडित गौरीशंकर जी से आशीर्वाद मिला था, “ काका एक प्रसिद्ध कवि के रूप में विख्यात होंगे।” रमई काका हास्य कवि के रूप में बहुत विख्यात रहे आप की प्रकाशित तीन काव्य पुस्तकों में 1——- ‘फुहार’ 2————-गुलछर्रा’ 3——————‘ हास्य के छींटे’ , हास्य व्यंग्य कविताओं के संकलन है । ‘बौछार’ आप की प्रथम और ‘भिनसार’ उनकी दूसरी कृति है । इन दोनों कृतियों में अधिकतर व्यंग्य रचनाएँ हैं । इन के बारे में संक्षिप्त जानकारी देखिए———- बौछार 1944 में छपी । ‘बौछार’ग्रामीण जीवन, प्रकृति चित्रण , छायावादी काव्य, राष्ट्र प्रेम, सामाजिक भावना, तथा जनवाद से प्रेरित तीस कविताओं का संकलन है। ‘भिनसार’में 42 कविताएँ हैं । जो वर्षा की बूँदों से तन ,मन से भिगोती हुई हास्य व्यंग्य कीमिठाससे भरी है।नेता जी सुभाष चन्द्र बोस पर लिखा गया है । यह आल्ह छन्द में रचित है । परम्परागत शैली में रचित यह बीर रस का अनूठी रचना है ।

‘ह्ररपति तरवारि’ , तथा ‘माटी के बोल’ शीर्षक पुस्तकों में अधिकांश गीत रचनाएं है । ये लोक धुन पर आधारित हैं । हास्य के छींटे ‘गुल छर्रा’ तीर के समान प्रहार करती हुई , उत्कृष्ट व्यंग्य चित्रों को उकेरतीं हुई , पाठकों का मनोरंजन करती है । यह खड़ी बोली की कविताओं का संकलन है । ये सभी काका के जीवन के उतरार्द्ध में लिखी गई थी । शेष सभी संकलनों की भाषा अवधी है । आप की पुस्तकों का प्रकाशन हज़ारों – हज़ारों की संख्या में हुआ । इनको पढ़ने वालों की संख्या भी कम नहीं हुआ करती थी । काका की तीन नाट्य कृतियों का भी प्रकाशन हुआ था । ‘रतौंधी’ पुस्तक में आठ और बहिरे बोधन बाबा शीर्षक पुस्तक में सात एकांकी नाटक संकलित हैं । काका के खड़ी बोली के चार एकांकी है । ये चारों एकांकी ‘ जुगुनू’ नामक पुस्तक में संकलित हैं।‘ कलुवा बैल ‘नामक एक उपन्यास (अवधी ) प्रकाशित नहीं हो सका था परन्तु ‘स्वतंत्र भारत’ पत्रिका में यह धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुआ था । काका की गम्भीर रचनाओं (लेखों ) का प्रकाशन आजतक नहीं हो पाया है । यद्यपि इस संकलन की अधिकांश कविताएँ ‘भिनसार’और ‘बौछार’में छप चुकी थी । किन्तु अधिकांश रचनाएँ आज भी अप्रकाशित ही है । इन रचनाओं में ‘भोर की किरण’,’सुखी कब होहिहे गाँव हमार’, ‘गाँव से है हमका बहुतप्यार’, ‘छातीकापीपर’, आदि अनेक लोकप्रिय कविताएँ है । काका के नाटकों का एक बहुत बड़ा भाग आज भी अप्रकाशित है । ‘हंस किसका है ‘ एक बालोपयोगी एकांकियों संकलनहै। यह अगर प्रकाशित डो तो छात्रों के लिए बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है ।बृद्धावस्था में ब्रंकाइटिस रोग से पीड़ित थे । अन्त में 1982 की फ़रवरी में इतने बीमार हो गए कि बिस्तर से उठ ही नहीं सके ।

अन्त में 18 अप्रैल 1982 की प्रात: काल आपने इस दुनिया से विदा ले लिया । उनका गाँव से प्यार तो बहुत ही था । वे बहुत ही सुसंस्कृत नागरिक थे। साधारण रहन सहन वाले चन्द्र भूषण त्रिवेदी गांधी,तुलसी तथा आर्य समाज के विचारों से प्रभावित थे। उनका गाँव आर्य समाज का गढ़ था । पंडित प्रयाग दत्त जो वेदों के प्रकांड विद्वान थे , उसी गाँव में रहते थे । वे असाधारण प्रतिभा के रचनाकार तो थे ही , साथ में लेखक, नाटककार, अभिनेता और संगीतज्ञ के रूप में भी कम सम्मान नहीं मिला । रमई काका के बिपुल साहित्य के अनुपलब्धयता के कारण उनके साहित्य को पढ़ने का उत्सुक एक बहुत बड़ा पाठक समुदाय अधिकांशतः अपने को हताश, निराश और निरुपाय अनुभव करता है । रमई काका के समग्र साहित्य का मूल्यांकन होना शेष है । रमईकाका का साहित्य सर्वाधिक पाठकों को सुलभ हो सके , इस का भी प्रयास भरपूर किया जाना चाहिए ।

                                                                                                       चित्रलेखा वर्मा

                                                                                                  दि इण्डियन बुक डिपो,

                                                                                       आदित्य भवन प्रथम तल अमीनाबाद,

                                                                                                            लखनऊ I    

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