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बच्चों से बलात्कारः  सरकारी लापरवाही से परेशान सुप्रीम कोर्ट सख्त कदम के मूड में

बच्चों से बलात्कारः सरकारी लापरवाही से परेशान सुप्रीम कोर्ट सख्त कदम के मूड में

कानूनी प्रावधानों और स्पष्ट दिशा निर्देशों के बाद भी बच्चों से बलात्कार के मामलों पर रोक न लग पाने पर सुप्रीम कोर्ट ने आज परेशानी जाहिर करते हुए संकेत दिए कि अब इसे लेकर कुछ सख्त कदम उठाए जाने जरुरू हो गए हैं.

इस मामले में सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता  वाली पीठ के पूछने पर इसे लेकर तैनात एमकिस क्यूरी और वरिष्ठ वकील  वी गिरी ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बाद भी कुछेक मीडिया हाइप वाले मामलों को छोड़कर बच्चों से बलात्कार के मामलों का किसी भी राज्य में ट्रायल छह महीने क्या एक साल में भी पूरा नहीं हुआ.

सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि दिल्ली  को छोड़कर किसी भी राज्य में पीड़ित बच्चों के लिए कोर्ट में अलग प्रतीक्षा कक्ष और गवाहों के परीक्षण के लिए अलग कक्ष नहीं बनाए गए पर यहां इतना जरुर हुआ भले ही इस राज्य में भी 170 मामलों में से मात्र दो मामलों में बच्चों के प्रति किए गए अपराध का ही ट्रायल साल भर में पूरा हुआ.

कोर्ट को बताया गया कि  बच्चोंं से बलात्कार के मामलों में 3457 मुकदमों के साथ यूपी पहले स्थान पर है जबकि कुल नौ  मुकदमों के साथ नगालैंड सबसे निचले पायदान पर जबकि देश भर में कुल चार फीसदी मामलों में ही सजा हो पाई है.

यूपी में तो कुल दर्ज मामलों में आधे का यानि 1779 मामलों की जांच तक पूरी  नहीं  हुई है चार्जशीट दाखिल करना तो दूर की बात जबकि मध्यप्रदेश दूसरे नम्बर पर है.

सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि देश भर में बाल बलात्कारों पर सजा की व्यवस्था दुरुस्त करने और पास्को अदालते बनाने के साथ क्रिमिनल जस्टिस की बहुत सी व्यवस्थाओं की जरुरत है जिसके लिए शीर्ष अदालत को ही पहल करनी होगी.

चीफ जस्टिस ने इसे सिस्टम की बदहाली बताया  जबकि सरकारी वकील का दावा था कि केंद्र  सरकार बच्चों के प्रति अपराध पर जीरो टालरेंस पालिसी के साथ काम कर रही है.

बहरहाल मौजूदा सिस्टम से असंतुष्ट पीठ  ने बच्चों से बलात्कार के सारे मामलों पर देश भर से दस दिन में सारे आंकड़े जुटाने के निर्देश देते हुए इस मामले की अगली सुनवाई 25 जुलाई को करने के निर्देश दिए हैें.

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