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सोशल मीडिया की जवाबदेही को लेकर अदालतें आक्रामक

सोशल मीडिया की जवाबदेही को लेकर अदालतें आक्रामक

मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि सोशल मीडिया कम्पनी अपने प्लेटफार्मों से प्रचारित की जा रही फर्जी खबरों और भड़काऊ भाषणों की जिम्मेदारी से बच नहीं सकती क्योंकि इससे समाज में नफरत तो फैलती ही है साथ ही कानून व्यवस्था के लिए भी समस्या पैदा हो सकती है.

न्यायमूर्ति एम सत्यनारायण और न्यायमूर्ति एन सेशासयी द्वारा शुक्रवार को दिए गए फैसले में कहा गया कि सरकारों को सोशल मीडिया को जिम्मेदार बनाने के लिए उसके खातों के सत्यापन का कोई तरीका निकालना चाहिए.

हालांकि व्हाट्सऐप के वकील ने इसका यह कहते हुए विरोध किया कि उनका प्लेटफार्म लोगों की निजता की गारंटी देता है और उसके खातों को अगर आधार कार्ड या फोन नम्बर या किसी और तरह से सत्यापित करने की कोशिश की गई तो इससे निजता का सिद्धांत टूट जाएगा पर अदालत ने इस दलील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि निजता सामाजिक समरसता और शांंति से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है.

उधर सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी सप्ताह केद्र सरकार को नोटिस जारी करके पूछा है कि सोशल मीडिया खातों को आधार जैसी किसी चीज से जोड़ने पर वह विचार कर रही है या नहींं.

सरकार को सुप्रीम कोर्ट को 24 सितम्बर तक जवाब देना है पर न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरूद्ध बोस की पीठ  के सामने महाधिवक्ता ने यह जरुर कहा कि हाईकोर्ट इस तरह के मामलों को अगर सुप्रीम कोर्ट को स्थानांतरित कर दें तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी.

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