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सुभाष के बहाने नेहरू को कटघरे में खड़ा करने की  सियासत का भंडा फोड़

सुभाष के बहाने नेहरू को कटघरे में खड़ा करने की सियासत का भंडा फोड़

मोदी सरकार आने के बाद वैसे तो हर समस्या के लिए नेहरू को जिम्मेदार ठहराने का जैसे फैशन सा बन गया  और  2016 में तो सरकार ने नेताजी सुभाष बोस की गोपनीय फाइले सार्वजनिक करने के नाम पर खुद को उनका फैन और नेहरू को उनके प्रति अपराधी साबित करने के लिए एक माहौल  बनाना शुरु किया था पर अचानक बिना वजह बताए इसे अचानक रोक दिया गया.

बताते हैं कि नेताजी सुभाष की फाइलें पलटते पलटते मोदी सरकार के सामने कुछ ऐसे भी तथ्य आए जिनसे ये साबित होता था कि नेहरू और सुभाष के बीच झगड़ा नहीं बल्कि जबरदस्त के दोस्ताना रिश्ते थे भले ही उनके बीच कुछ मुद्दों को लेकर मतभेद थे पर मनभेद हर्गिज नहीं थे.

दोनों बड़े नेता समाजवाद से प्रभावित थे पर सुभाष की सैन्य क्रांति के प्रति ज्यादा झुकाव बाद में कांग्रेस और गांधी जी से उनकी दूरियों की वजह जरूर बना पर यह भी सही है कि नेहरू के प्रति सद्भावना का सबसे बड़ा सुबूत यह है कि सुभाष द्वारा गठित इण्डियन नेशनल आर्मी मे बाकायदा नेहरू ब्रिगेड का गठन किया गया था.

सरकार को सुभाष बोस की गोपनीय फाइलों से यह भी पता चला है कि नेताजी के लापता हो जाने के बाद नेहरू न सिर्फ उनके परिवार से लगातार सम्पर्क  में रहे बल्कि इस परिवार की मदद के लिए नेहरु ने उस समय अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के जरिए दो लाख रुपए से एक ट्रस्ट बनाया था जिसके ट्रस्टी खुद नेहरू और उस समय के पश्चिमी बंगाल के मुख्यमंत्री विधान चन्द्र राय थे.

इन्ही फाइलों में एक कागज मिला है जिस पर नेहरू के दस्तखत हैं और जो 23 मई 1954 का है जिसमें लिखा है   “डॉ. बी. सी. राय और मैंने आज वियना में सुभाष चन्द्र बोस की बच्ची के लिए एक ट्रस्ट डीड पर हस्ताक्षर किये हैं…दस्तावेज़ों को सुरक्षित रखने के लिए मैंने उनकी मूल प्रति एआईसीसी को दे दी है.”

इस ट्रस्ट की ओर से वियना में पढ़ रही नेताजी सुभाष बोस की बेटी अनिता बोस को हर महीने पांच सौ रुपयों की मदद दी जाती थी और नेताजी की ये बेटी अब जापान की राजनीति में सक्रिय हैं और कुछ समय पहले तक अपनी मां के साथ रहती वहीं रह रहीं थीं.

दस्तावेज ये भी बताते हैं कि इस मदद को 1965 में अनिता बोस की शादी के बाद बंद कर दिया गया.

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