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यूपी में भी कई जगहों पर जलाया नहीं पूजा जाता है रावण का पुतला

यूपी में भी कई जगहों पर जलाया नहीं पूजा जाता है रावण का पुतला

यूं तो देश में तमाम जगहो पर दशहरे के दिन रावण का पुतला जलाए जाने की जगह उसकी पूजा की जाती है और ऐसी कई जगहें उत्तर प्रदेश में भी जहां असुर जाति के इस महाप्रतापी-महाशक्तिशाली राजा की न सिर्फ पूजा की जाती है बल्कि उससे साल भर आने वाले संकटों से बचाने की याचना भी की जाती है.

दशहरे की अगली सुबह देश भर के अखबार जहां धूम धाम से जलाया गया रावण का पुतला सरीखी हेडलाइनों से भरे होते हैं वहीं समाचार माध्यमों में भले रावण को पूजे जाने की खबरें जगह न पाती हों पर लाखों लोग की आस्थाएं रावण के कल्याणकारी महापंडित स्वरूप से भी जुड़ी है.

वैसे तो कानपुर के शिवाला इलाके में भी रावण का मंदिर है पर दो ऐसी  जगहें और भी हैं जो रावण की मौत का शोक मनाने के लिए  काफी चर्चित हैं और ये हैं  ग्रेटर नोएडा का बिसरिख गांव और इटावा का जसवंतनगर.

ग्रेटर नोएडा के करीब स्थित बिसरिख गांव तो ऐसा है जहां राम रावण युद्ध में रावण के मारे जाने को लेकर किसी तरह की खुशी नहीं बल्कि दुख मनाया जाता है क्योंकि ये वही गांव हैं जहां रावण का बचपन बीता था और जहां उसके पिता ऋषि विश्रवा रहा करते थे और इसी गांव से वे रोज पूजा करने गाजियाबाद के प्रसिद्ध दूधेश्वर नाथ मंदिर जाया करते थे.

जिस जगह रावण के पिता रहा करते थे वहां अब  रावण का  मंदिर  है और पूरा गांव जहां राम को अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं वहीं इस गांव के आसपास सारस्वत ब्राह्मणों के साथ मिलकर यहां के लोग दशहरे के दिन रावण मृत्यु के शोक मेंं यज्ञ करते हैं और उससे अपनी सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं.

इसी तरह इटावा के जसवंत नगर में भी रावण का पुतला तो बनाया जाता है पर उसका दहन नहीं किया जाता बल्कि उसे पत्थरों से मारकर नष्ट किया जाता है और फिर रावण का प्रसाद मानकर पुतले की लकड़ियों को लोग घर ले जाते हैं ताकि साल भर ईश्वरीय आपदाओं से उनका परिवार बचा रहे.

164 साल से हो रही ये रामलीला सिर्फ  1857 की क्रांति के साल को छोड़कर लगातार हो रही है और 2010 में तो यूनेस्कों ने भी इसे सबसे अलग रामलीला के तौर पर स्वीकार किया.

अगर पूरे देश में कहा जाए तो हिमाचल के कांगड़ा जिले के एक पहाड़ी कस्बे मेंं रावण के पुतले को जलाना भी पाप माना जाता है क्योंकि ये वो जगह है जहां रावण ने घनघोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था और भगवान ने उसकी नाभि में अमृत स्थापित किया था.

इसी तरह रावण की पत्नी मंदोदरी श्रीमाली ब्राह्मण समाज से थीं और इस समाज के जो लोग राजस्थान के जोधपुर स्थित मंडोर में रहते हैं वो दशहरे के दिन शोक मनाते हैं क्योंकि इस दिन उनकी परिवार की एक यशस्वी बेटी विधवा हुई थी और इसी तरह मंदोदरी का जन्म स्थान मध्य प्रदेश के विदिशा में हैं इसलिए यहां और मंदसौर में भी लोगों के लिए रावण आराध्य है.

आंध्र प्रदेश के काकिनाड, महाराष्ट्र के अमरावती स्थित गढ़ चिरौली सहित उत्तराखंड का कुल्लू ऐसे इलाकों में शामिल है जहां रावण का पुतला नहीं जलाया जाता.

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