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दिवालियेपन की कगार पर खड़ा पाकिस्तान

पाकिस्तान की नई सरकार ने चुनावों में जनता को जो सब्जबाग दिखाए थे उन्हें पूरा क्या शुरू करने के लिए भी इमरान सरकार के पैसा नहीं है क्योंकि मुल्क दिवालिएपन की कगार पर खड़ा है और दिवालिया होने से बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के सामने एक बार फिर कटोरा लिए खड़ा है.

हालत इतनी गम्भीर है कि पेट्रोल-डीजल की जरुरतें पूरी करने के लिए पिछले कई महीनों से एक लाख बैरल से ज्यादा पेट्रोल-डीजल सऊदी अरब से एक महीने की उधारी पर ले रहा है और अब उसने सऊदी के सामने यह मांग भी रख दी है कि इतना ही तेल उसे और उधार दिया जाए जिसका भुगतान वह यह संकट का दौर खत्म होने के बाद करेगा.

पाकिस्तानी रुपया अंतर्राष्ट्रीय बाजार में लगातार गिर रहा है और एक अमेरिकी डालर के मुकाबले पाकिस्तानी रुपए की कीमत अब 120 हो चुकी है और देश का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर आधे से कुछ ज्यादा ही रह गया है और अगर कोई रास्ता नहीं निकला तो ये दस हफ्तों में ही खत्म हो जाएगा.

शायद इसीलिए पाकिस्तान  के नए प्रधानमंत्री इमरान खान ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया है कि हमारे पास विदेशी कर्जे की किश्ते क्या उनका ब्याज चुकाने का भी पैसा नहीं है.

उधर अमेरिका में ट्रम्प के सत्ता सम्भालने के बाद पाकिस्तान को मिलती आ रही आर्थिक मदद में भारी कटोती ने उसकी कमर ही तोड़ दी तो चीन की  यह चाल पाकिस्तान को अब समझ में आई है कि वह पांच से छह अरब डालर का कर्जा लादकर और आर्थिक कारीडोर के जरिए कुछ और नहीं अपनी आर्थिक गुलामी उस पर थोप रहा है.

इसके बाद भी हालात इतने खराब है कि यह जानते हुए भी पाकिस्तान  ने चीन से दो अरब डालर का कर्जा लम्बे समय के लिए देने की मांग  की है.

लेकिन पाकिस्तान का निजाम जानता है कि चीन से कर्जा मिल भी गया तो कोई खास भला नहीं होगा इसलिए अब वह अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एक बार फिर  बेलआउट पैकेज लेने की अर्जी लेकर पहुंच चुका है जबकि 2013 में ही 6.7 अरब डालर का बेलआउट पैकेज लेते समय पाकिस्तान ने भरोसा दिलाया था कि आगे से वह कोई भी बड़ा कर्ज लेने से पहले उसे उसके विवरण साझा करने होगें साथ ही चीन पाकिस्तान आर्थिक कारीडोर की भी सारी आर्थिक जानकारी देनी होगी.

जाहिर है कि यह चीन को पसन्द नहीं आएगा पर अभी भी पाकिस्तान पुरानी गल्तियों से कुछ सीखने जा रहा हो ऐसा नहीं लगता क्योंकि न तो विदेशी आयात घटाने की कोई बात हो रही है न टैक्स सुधारों की और न ही गरीबी में रहकर भी घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने की.

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