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एक देश एक चुनाव की सोच नई भी नहीं फिर इतना विरोध क्यो….

एक देश एक चुनाव की सोच नई भी नहीं फिर इतना विरोध क्यो….

यह सच है कि अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों  के बाद देश  सिद्धांतरूप से एक देश एक चुनाव की बात स्वीकार भी कर लेता है तो ऐसा पहली बार नहीं होगा जब लोकसभा और राज्यो की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएंगे .

सच्चाई तो यह है कि इससे पहले कम से कम चार मौके ऐसे आएं हैं जब बिना एक देश एक चुनाव की दुहाई दिए लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए गए हैं.

देश ने जब लोकतंंत्र को व्यवहारिक रूप से स्वीकार किया था और देश में पहली बार 1951-52 में चुनाव हुए थे तो स्वाभाविक है कि उस समय  लोकसभा चुनाव और सभी राज्यों की विधानसभाओं के  चुनाव एक साथ कराए गए थे.

लेकिन इसके बाद फिर 1957, 1962 और 1967 में फिर स्थितियांं ऐसी बनीं कि विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा के साथ कराने पड़े लेकिन उसके बाद से यह सिलसिला जरूर टूट गया.

अब अपने पिछले कार्यकाल के दौरान मोदी सरकार ने वर्ष  1999 में विधि आयोग द्वारा सुझाए गए एक देश एक चुनाव के सुझाव को झाड़ पोंछकर फिर से निकाला था और दोबारा सरकार बनने पर वह इसे लेकर कुछ ज्यादा ही गम्भीर दिखाई दे रही हैै.

इस सिलसिले में प्रधानमंत्री ने बुधवार को एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जिसमे बुलाया तो कोई चालीस विपक्षी दलों को गया था पर आए करीब 21 दल ही पर इसमें प्रधानमंत्री मोदी ने यह ऐलान जरूर कर डाला कि एक देश एक चुनाव लागू करने के लिए उनकी सरकार एक समिति बनाएगी ताकि सबकी राय लेकर इसे लागू किया जा सके.

बैठक के बाद दावा किया गया है कि इसमें ज्यादातर दल इस सिद्धांत से सहमत थे पर कांग्रेस, बसपा.सपा, तृणमूल समेत 16 दल जिन्होंने बैठक का बहिष्कार किया वो इस प्रस्ताव के पीछे मोदी सरकार की बुनियादी साजिश और  इसे राज्यों में भी पीएम मोदी की लोकप्रियता भुनाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं.

इस  सोच की आलोचक पार्टियां जहां इसे संघवाद की बुनियादी सोच के खिलाफ मान रही हैं वहीं कुछ कानून के जानकारों की अपनी राय है कि यह केवल राष्ट्रपति शासन  प्रणाली में ही व्यवहारिक हो सकती है भारत जैसी चुनाव व्यवस्था रखने वाले देश के लिए इस लागू करना सम्भव नहीं है भले ही एक दो चुनावों में कोई पार्टी इसे लागू करके फायदा उठा ले.

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