बिजली संकट का शोर: क्या रची जा रही है बड़ी साजिश

      (अनिल सिन्हा)

देश की मीडिया में इस समय कोयले की किल्लत के चलते बिजली संकट के खतरे को लेकर बड़ा शोर है जबकि सरकारी आंकड़े बताते हैं कि न तो कोयले का उत्पादन घटा है और ना ही बिजली संकट की कोई स्वाभाविक संभावना है यानि यह संकट तभी आएगा जब इसे जानबूझकर पैदा किया जाएगा।

सरकार के अपने आंकड़ों के अनुसार देश में बिजली की कुल मांग कोई दो लाख मेगावाट की है और उत्पादन क्षमता 3.9 लाख मेगावाट की है यानि लगभग दो गुनी और सौर और पवन उर्जा जैसी वैकल्पिक ऊर्जा जिसे अहमियत ही नहीं दी जाती उसकी क्षमता भी कोई डेढ़ लाख मेगावाट की है।

यानि ये आकड़े साफ बताते हैं कि बिजली संकट तभी हो सकता है जब ताप बिजली संयंत्र कोयले की कमी से चल ही न सकें क्योंकि सत्तर फीसदी बिजली कोयले से ही बनती है।

तो सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि देश में कोयले का उत्पादन भी गिरा नहीं है और मानसून में भी नहीं।

पिछले साल अप्रैल से सितंबर तक के छह महीनों में कोयले का उत्पादन देश में 28.2 करोड़ टन था जो इस साल 12 फीसदी की बढ़कर 31.5 करोड़ टन हो गया और पूरे साल का आंकड़ा देखे तो भी कोयला उत्पादन कोई खास नहीं घटा है।

इतना ही नहीं देश का कोई भी बिजलीघर ऐसा नहीं है जहां कुछ घंटों या एक दिन में कोयला पहुंचाया न जा सकता हो यानि बिजली घरों में कोयले का संकट तभी पैदा होगा जब उसे पैदा किया जाएगा।

तो फिर यह शोर क्यों कि देश के चार बड़े बिजलीघरों में कोयला खत्म हो चुका है  भले ही उनका नाम सरकार घोषित नहीं कर रही।

जानकारों की मानें तो यह पूरी साजिश सरकार की कुछ चहेती बड़ी कंपनियों जैसे टाटा पावर और अडानी को कुछ बड़ी छूट देने की है।

निजी पॉवर कंपनियां अपने लिए अलग कोल ब्लॉक के साथ कोल इंडिया जैसी वह छूट चाहती हैं जिसमें स्थानीय लोगों को मुआवजा दिए बिना भी वो कोयला निकाल सकती हैं ।

इसके साथ ही खबर है कि निजी कंपनियां राज्यों को बेची जाने वाली बिजली की दरें भी रेलवे के तत्काल टिकटों की तरह मांग और आपूर्ति के सिद्धांत पर चाहती हैं यानी जेब तो जनता की कटनी ही है।

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