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गर्भ समापन के सारे अधिकार महिलाओं को देने के पक्ष में नहीं है मोदी सरकार

गर्भ समापन के सारे अधिकार महिलाओं को देने के पक्ष में नहीं है मोदी सरकार

मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह साफ कह दिया है कि गर्भ समापन के सारे अधिकार वो महिलाओं को देने के पक्ष में नहीं हैं और मां व उसके अजन्मे बच्चे के लिए सरकार की जो जिम्मेदारियां हैं उसकी अनदेखी करने को वो तैयार नहीं है.

यह बातें मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में गर्भ गिराए जाने की समय सीमा बीस हफ्ते से बढ़ाकर 26 हफ्ते किए जाने के लिए एक डाक्टर निखिल दातार की याचिका के जवाब में कही.

सरकार ने 11 सितम्बर को दाखिल अपने जवाब में कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन आफ प्रिग्नैनसी एक्ट 1971 में बदलाव की इस मांग से वो कतई सहमत नहीं है.

दूसरी ओर इस मांग को लेकर अदालत जाने वाले डाक्टर का तर्क है कि कई बार भ्रूण में ऐसी विसंगतियां होती है कि उसका समापन बीस हफ्ते की समय सीमा के बाद भी किए जाने की जरुरत होती है.

डाक्टर की ओर से पेश महिला वकील का भी तर्क है कि एक महिला को अपने शरीर पर अधिकार न देने में कौन सी व्यवहारिकता है क्योंकि चाहेे गर्भ रखना हो या उसका समापन करना हो दोनों ही स्थितियों में भोगना तो स्त्रियों को ही पड़ता है.

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