Share
टूट गया मायावती का सपना…

टूट गया मायावती का सपना…

2019 के नतीजों ने बसपा सुप्रीमों मायावती के सपने को बुरी तरह चकनाचूर कर दिया या यूं कहें कि शायद अब उन्हेंं सपने देखने लायक भी नहीं छोड़ा.

सपा बसपा मिलकर यूपी में भाजपा और मोदी की जीत पर लम्बा विराम लगा देगें इसे पर वोटों के गणित के सहारे भरोसा करने वाली इन दोनों पार्टियों की सारी तैयारियां नतीजे आने के बाद न सिर्फ धरी रह गई बल्कि मायावती के लिए इस तरह की कोई सम्भावना भी नहीं छोड़ी कि वो देश का प्रधानमंत्री बने रहने का सपना देख सके.

पिछले दिनों आंध्र के जिन मुख्यमंत्री चन्द्र बाबू नायडू से मायावती ने प्रधानमंत्री बनने की इच्छा जताई थी और जो खुद केंद्र में गैर भाजपा सरकार बनवाने के लिए खासे सक्रिय थे वे खुद इन चुनावों में ऐसे धुले कि आज शाम या कल तक उन्हें खुद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की तैयारियां शुरु करनी पड़ रही हैं.

भाजपा के ही एक बड़े नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने मायावती ने को ये उम्मीद दिखाई थी कि वे भाजपा और एनडीए की मदद से भी प्रधानमंत्री बन सकती हैं और इसी का नतीजा रहा कि वोटों की गिनती के कुछ दिन पहले ही चन्द्र बाबू नायडू से  साफ कहा था कि जो भी उन्हें पीएम बनाएगा वो उसके साथ जा सकती हैं लेकिन अब ऐसी कोई स्थिति ही नहीं रह गई.

लेकिन मायावती का सपना टूटने का मतलब अगर भाजपा के लोग ये  निकालते हैं कि सपा और बसपा उत्तर प्रदेश में एकदम महत्वहीन हो गई हैं तो ये उनकी गलत फहमी होगी क्योंकि 2014 के चुनाव से 21 सीट के आसपास जीतकर वो खुद जिन्दा तो  बनी रहेगी भले ही उनकी ताकत भाजपा से काफी कमजोर मान ली जाए पर ये नहीं भूलना चाहिए कि ये कमजोरी केंद्र की सरकार चुनने के समय की है और दो साल बाद जब राज्य विधानसभा के चुनाव होंगे तब तस्वीर दूसरी भी हो सकती है.

इसमें यह सवाल जरूर  महत्वपूर्ण रहता है कि विधानसभा चुनाव तक सपा -बसपा का यह गठबंधन किस तरह कायम रहता है क्योंकि इस तालमेल का फायदा बसपा को ज्यादा और सपा को कम मिला है.

वैसे यह भी सही है कि उत्तर प्रदेश में बसपा के दलित वोट बैंक और सपा के यादव वोट बैंक में कामयाबी से सेंध लगाने वाली भाजपा के पास आज अमित शाह जैसे राष्ट्रीय अध्यक्ष है जो शायद चौबीस घंटे में एक जमाने के मुलायम सिंह यादव की तरह 18 घंटे से ज्यादा समय राजनीति को समर्पित करता है जबकि चाहे मायावती हों या अखिलेश यादव इच्छाएं पालने के साथ राजनीति में इतनी मेहनत करना शायद अब उनके बूते के बाहर हो चुका है.

सपा में बगावत करके अलग पार्टी बनाने वाले शिवपाल सिंह यादव को इन चुनावों ने आइना दिखा दिया है वहीं कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में गठबंधन की राजनीति से अपनी पार्टी की मजबूती के लिए किनारा करके भाजपा की मदद तो की है पर अपना कितना भला किया है यह तो अंतिम चुनावी आंकड़े आने के बाद साफ होगा क्योंकि सीटों के लिहाज से तो अब देश की इस सबसे बड़ी पार्टी को कम से कम यूपी में किसी बिल्कुल नई बनी पार्टी की तरह राजनीति का कखग सीखना होगा.

Spread the love

Leave a Comment