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आर्थिक विकास दर में भारी गिरावट -बेरोजगारी नई ऊंचाइयां छूने को तैयार

आर्थिक विकास दर में भारी गिरावट -बेरोजगारी नई ऊंचाइयां छूने को तैयार

भारतीय विकास दर सितम्बर में खत्म हुई तिमाही में गिरकर  साढ़े चार फीसदी  तक पर पहुंच चुकी है जो इस बात का साफ संकेत है कि नौकरी तलाशने वालों के लिए अब और मुश्किल समय शुरु होने जा रहा है.

अर्थशास्त्रियों की मानें तो मोदी सरकार ने अब अगर कुछ खास कदम नहीं उठाए और विकास दर ने आठ फीसदी का आंकड़ा नहीं छुआ तो बेरोजगारी विस्फोट जैसी स्थिति से देश को बचाना मुश्किल हो जाएगा.

केंद्रीय वित्त मंत्री भले ही दावा करें कि देश में आर्थिक मंदी नहीं है पर तमाम अर्थशास्त्रियों की राय  में भारत में आर्थिक मंदी है और ये अभी कम से कम दो-तीन साल चल सकती है जिसका अंदाजा इस  बात से ही लगाया जा सकता है कि सरकार ने बजट में पूरे साल के लिए जो राजस्व घाटा तय किया था वह दो महीने पहले ही अक्टूबर में हासिल हो गया.

मतलब साफ है कि न तो रिजर्व बैंक द्वारा पांच बार घटाए गए रेपो रेट का और न ही जनता के हाथ में धन रहे इसके लिए बढ़ाई गई आयकर सीमा और अन्य तरीकों को देश की आर्थिक हालत सुधारने में कोई मदद मिल रही है.

सितम्बर में समाप्त हुई तिमाही में साढ़े चार फीसदी के विपरीत 2018 की इसी तिमाही में विकास दर सात फीसदी थी यानि रिजर्व बैंक पर एक बार फिर अपनी दरों में कटौती का दबाव है और वो क्या फैसला लेती है ये अगले हफ्ते होने जा रही बैठक के बाद सामने आ जाएगा.

उधर सरकारी स्तर पर देखा जाए तो लगता है कि देश के कामगार तबके की नाराजगी मोल लेते हुए मोदी सरकार अब लेबर रिफार्म पर काम करने जा रही है ताकि विदेश आकर्षित होकर देश में फैक्ट्रियां लगाएं और वहीं से कुछ रोजगार पैदा हो लेकिन घरेलू बाजार की गिरावट में उसकी ये कोशिशें कितनी कारगर साबित होती हैं ये तो समय ही बताएगा.

 

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