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इस बार प्रधानमंत्री दक्षिण भारत से, समीकरण  बैठाने की जुगाड़ शुरू

इस बार प्रधानमंत्री दक्षिण भारत से, समीकरण बैठाने की जुगाड़ शुरू

इन चुनावों में भाजपा की कमजोर पड़ने की सम्भावनाओं को देखते हुए दक्षिणी राज्यों की तरफ से एक बार फिर देश का अगला राष्ट्रपति दक्षिण भारत से बनाए जाने के लिए नए सिरे से प्रयास शुरू कर दिए गए हैं.

इस नई पहल के साथ ही 1996 की तर्ज पर यूनाइटेड फ्रंट जैसा तालमेल बनाने की कोशिशे की शुरुआत कहा जा सकता है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव यानि केसीआर ने शुरु की है जो अगला प्रधानमंत्री दक्षिण भारत से बनवाने के लिए सभी 21 क्षेत्रीय पार्टियों को दिल्ली में एक मंच पर लाना चाह रहे हैं और इसके लिए उन्होंने इसी हफ्ते केरल की वामपंथी सरकार के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन से मुलाकात की हैै.

मिलना तो वो डीएमके नेता स्टालिन से भी चाह रहे थे पर चुनावों में अति व्यस्त होने के कारण अभी उनसे मुलाकात नहीं हो पाई है पर यह तय है कि हफ्ते भर के भीतर ही केसीआर इस प्रस्ताव को लेकर न सिर्फ स्टालिन से बल्कि उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के दोनों बड़े नेताओं सहित सभी क्षेत्रीय दलों से मिल लेंगे.

भले ही इसकी पहल केसीआर ने की हो पर उनके राजनीतिक विरोधी माने जाने वाले आंध्र के मुख्यमंत्री चन्द्र बाबू नायडू भी इस पहल को नजरंदाज करने की स्थिति में अब नहीं रह गए हैं.

दरअसल इस बार के चुनावों में राजनीति के इन धुरंधरों को लगने लगा है कि भाजपा भले ही सबसे बड़े दल के रूप में उभरे पर वो सरकार बनाने की हैसियत में नहीं होगी और उसके सहयोगी दल भी इस बार तो नरेन्द्र मोदी की आत्म केंद्रित कार्यशैली के कारण उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में नहीं रहेंगे.

दूसरी ओर देश की दूसरी बड़ी पार्टी कांग्रेस भी इस बार 90 से सौ सीटों के बीच ही सिमट सकती है जिससे राहुल गांधी को ही प्रधानमंंत्री बनवाने के लिए वो भी कोई दबाव कायम करने की हैसियत में नहीं होगी.

ऐसी हालत में 1996 की तरह कांग्रेस के समर्थन से केंद्र में एक बार फिर गैर भाजपा गैर कांग्रेस सरकार बनवाई जाती है और चूंकि राहुल गांधी खुद हर मंच पर कह रहे हैं कि उनकी रणनीति भाजपा और नरेन्द्र मोदी को रोकना होगा तो इस नई सरकार को समर्थन देने से वे भी पीछे नहीं हट सकते.

ये दल चुनावों के बाद राष्ट्रपति को भी एक पत्र देकर उनसे अपील करने वाले हैं कि वे सरकार बनाने के लिए सबसे बड़े दल को आमंत्रित करनी बजाए उस तालमेल को बुलाए जो स्थाई सरकार दे सकता हो.

इस दावे को मजबूती देने के लिए इस पत्र पर सभी क्षेत्रीय दलों के दस्तखत कराए जाएंगे और तब इसे राष्ट्रपति को सौंपा जाएगा.

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