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दुनिया को इंटरनेट देने वाले टिम बर्नर तीस साल बाद भी डिजिटल दुनिया से खुश नहीं …

दुनिया को इंटरनेट देने वाले टिम बर्नर तीस साल बाद भी डिजिटल दुनिया से खुश नहीं …

दुनिया को इंटरनेट देने वाले प्रोफेसर सर टिम बर्नर्स ली अब इसे अपने सपनों की ईमानदार डिजिटल दुनिया बनाने के लिए कुछ नए तरीकों की खोज में लगे हैं…

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दुनिया को इंटरनेट देने वाले या यूं कहें कि वर्ल्ड वाइड वेब यानि डब्लू डब्लू डब्लू के जरिए पूरी दुनिया को एक ग्लोबल गांव मेंं बदल देने वाले सर टिम बर्नर्स ली फिलहाल डिडिटल दुनिया के तीस साल के सफर को लेकर अब उतने खुश नहीं हैं जितना उन्हें होना चाहिए था क्योंकि इस नई दुनिया के विस्तार के साथ ही इस पर झूठों और ठगों का जो जाल बिछ चुका है उस पर रोक का कोई तरीका फिलहाल उन्हें सूझ नहीं रहा.

इस समय आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के रूप में काम कर रहे ली ने 1989 के मार्च महीने में ही हाइपरटेक्स्ट ट्रांसफर प्रोटोकॉल यानि एचटीटीपी की नई सोच देकर मौजूदा इंटरनेट की नींव रखी थी और इस विचार को देते समय वह खुद जानते थे कि उनकी ये खोज दुनिया पर राज करेगी लेकिन जब आज दुनिया में करीब दो अरब वेबसाइटें चल रही हैं और आधी दुनिया इंटरनेट से जुड़ी हो ली खुश होने से कहीं ज्यादा परेशान हैं.

इसी महीने 12 मार्च को इंटरनेट की वर्षगांठ के मोके पर यूरोपीयन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च यानि सर्न और वेब फाउंडेशन द्वारा आयोजित किए गए  कार्यक्रम में टिम ली ने साफ कहा कि आज हमारे पास बहुत विस्तार के बावजूद फेल वेब दुनिया है जिसका विस्तार तो बहुत हुआ पर आज इस पर सरकारों और कारपोरेट घरानों का कब्जा है और जो गलत जानकारियों का भंडारागार भी बन चुका है जिसकी खुली मिसाल हम अमेरिका में ट्रम्प के चुनाव और ब्रेक्सिट के समय देख चुके हैं.

इंटरनेट के इस रचनाकार ने दुनिया को यह भरोसा दिलाते हुए बेहतर वेब दुनिया बनाने की दिशा में काम करने और इस काम में सबके साथ आने की अपील भी की.

ली इस समय इसी दिशा में काम कर रहे हैं और मोटे तौर पर उन्होंने दो समस्याएं चिन्हित की है पहली झूठी या साजिशी जानकारियों का जंगल और इंटरनेट का रेवेन्यू माडल जो ताकतवर लोगों को इसमें मदद करता है.

इंटरनेट के इस रिसर्चर का कहना है कि पहली बात पूरी तरह से खत्म कर देना तो सम्भव नहीं है पर वेब फाउंडेशन ने पिछले साल ही नया कांट्रेक्ट बनाकर देशों की सरकारों से इसके लिए कानून बनाने और एक घोषणापत्र में शामिल होने की पहल शुरु कर दी है और दूसरी समस्या के तहत इंटरनेट पर रेवेन्यू का कोई अन्य माडल तैयार करने पर काम चल रहा जिसमें किसी वेबसाइट पर क्लिक को अर्थ तंत्र से न जोड़ा जाए.

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