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क्या सच  में मोदी सत्ता का गुलाम हो चुका है भारत का मीडिया….

क्या सच में मोदी सत्ता का गुलाम हो चुका है भारत का मीडिया….

दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पत्रकारिता में कितना बड़ा अंतर है इसे उजागर किया है आजतक और एबीपी चैनलों में काम कर  चुके वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने मीडिया विजिल डाट काम में लिखे एक लेख में.

इस लेख में उन्होंने सीएनएन के पत्रकार  जिम अकोस्टा का व्हाइट हाउस  का पास रद्द करने पर अमेरिकी मीडिया संस्थानों की एक जुटता और फिर ट्रम्प को अपना फैसला  वापस लेने की मजबूरी से भारतीय पत्रकारिता की तुलना करते हुए लिखा है कि भारत  में हालत बहुत खराब है और ‘मोदी सत्ता ने किया था एबीपी में क़त्लेआम! स्वत: संज्ञान लें चीफ़ जस्टिस.

यह सही है कि अमेरिक मे फाक्स न्यूज जैसे मीडिया हाउस  भी सीएनएन के साथ खड़ा नजर आया जो  राष्ट्रपति ट्रम्प का समर्थक मीडिया घराना माना जाता है  लेकिन ऐसा माहौल भारत में शायद सम्भव ही नहीं है जहां प्रधानमंत्री अगर एक मीडिया घराने पर दबाव बनाते हैं तो दूसरे बिना कारण या तो डर जाते हैं या इस  प्रधानमंत्री से करीबियां बनाने के मौके के तौर पर देखने लगते है.

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नाराजगी के बाद एबीपी चैनल से जिस तरह पुण्य प्रसून और अभिसार शर्मा हटाए गए वो मीडिया को भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ और उसकी निष्पक्षता की बात कहने वालों को आइना दिखाने के लिए काफी है.

इस लेख में पुण्य प्रसून ने अपने उस टीवी कार्यक्रम की विडियो क्लिप भी शेयर की है जिसके कारण पीएम मोदी ने एबीपी चैनल पर हर तरह का दबाव बनाया और जिसका नतीजा रहा इन पत्रकारोे की नौकरी जाना.

हम मीडिया विजिल में प्रकाशित  इस लेख  के कुछ चुनिन्दा अंश उनसे अधार लेकर प्रकाशित कर  रहे हैं ताकि खबरों की दुनिया का पर्दे में छिपा सच भी लोग जान सकें.

लेख के  अनुसार  मीडिया की आजादी का सवाल उठना! अदालत का पत्रकार के हक में फैसला देना! ये दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र की परिपक्वता है लेकिन भारत में  पत्रकार का प्रधानमंत्री के दावे को ग्राउंड रिपोर्ट के जरिए  गलत बताने पर  सरकार का गुस्से में आना और  मीडिया संस्थान पर दबाव बनाना यह भारत  की सच्चाई है.

इस एक कार्यक्रम के वक्त न्यूज चैनल के सैटेलाइट लिंक को डिस्टर्ब करना! फिर तमाम विज्ञापन दाताओ पर दवाब  बनाना और  अंतत: पत्रकार का मीडिया संस्थान को छोडना! और सरकार का ठहाके लगाना! ये दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्रिक देश में लोकतंत्र का कच्चापन है!

अमेरिकी घटना के बाद अगर मुझे निजी तौर पर महसूस हो रहा है कि क्या वाकई सत्ता को सीख देने के लिये मीडिया संस्थान को अदालत का दरवाजा खटखटाना नहीं चाहिये था?

पत्रकार अगर तथ्यों के साथ रिपोर्टतार्ज तैयार कर प्रधानमंत्री के झूठे दावो की पोल खोलता है तो क्या वह अपने प्रोफेशन से ईमानदारी नहीं कर रहा है?

दरअसल जिस तरह अमेरिका में सीएनएन ने राष्ट्रपति के मनमर्जी भरे फैसले से मीडिया की स्वतंत्रता के हनन समझा और अदालत का दरवाजा खटखटाया, उसके बाद ये सवाल भारत में क्यो नहीं उठा कि सरकार के खिलाफ, जिसकी अगुवाई पीएम कर रहे हैं उनके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया जाना चाहिये?

ये किसी को भी लग सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति तो सीधे सवाल करते हुये सीएनएन पत्रकार दिखायी दे रहा है पर  ऐसा भारत मे तो दिखायी नहीं देता! फिर किसे कैसे कटघरे में खडा किया जाता? तो जरा सिलसिलेवार तरीके से हालात को समझें.

एनडीटीवी और उसके मुखिया प्रणव राय को निशाने पर लेते हुये सीबीआई – इनकम टैक्स अधिकारी पहुंचते हैं तो निशाने पर और कोई नहीं मोदी सत्ता ही आती है.

फिर क्विंट के दफ्तर पर छापा पड़ता है तो किसी और को नहीं सीधे मोदी को ही जिम्मेदार माना जाता है और कभी भी कहीं भी ऐसा दस्तावेज़ सामने आया नहीं जिससे कहा जा सके कि छापा मारना सही था.

यानी किसी को भी सामाजिक तौर पर बदनाम करने के लिए अगर सत्ता ही संवैधानिक संस्थानों का उपयोग करने लगे तो ये सवाल उठना जायज़ है कि आखिर अमेरिकी तर्ज पर कैसे मान लिया जाये कि भारत में लोकतंत्र जिन्दा है या  मोदी विरोध को कैसे भारत विरोध से जोड़ा जा रहा है.

इस दौर में सीबीआई की साख इतनी मटियामेट हो गई कि सुप्रीम कोर्ट में ही झगड़ा नहीं गया बल्कि जांच करने वाली देश के सबसे बडी एंजेसी  सेन्द्रल विजिलेंस कमीशन तक पर अंगुली उठने लगीऔर संघीय ढांचे पर खतरा इस तरह मंडराने लगे कि आंध्रप्रदेश और बंगाल ने सीबीआई की जांच से नाता तोड़ उनके अधिकारियों पर राज्य में घुसने पर प्रतिबंध लगा दिया

चूंकि लोकतंत्र का दायरा बार  बार मोदी सत्ता से टकरा रहा है, तो फिर ऐसे में टेस्ट केस एबीपी न्यूज चैनल को ही बनाया जा सकता है।  इस न्यूज चैनल के कार्यक्रम “मास्टरस्ट्रोक” में प्रधानमंत्री के दावे की पोल खोली गई जिससे नाराज होकर मोदी सरकार के तीन कैबिनेट मंत्रियों ने ट्वीट किया।

9 जुलाई को बकायदा सच नाम से मास्टरस्ट्रोक कार्यक्म में हर किसी ने देखा। लेकिन इसके बाद सत्ता की तरफ से खामोशी के बीच झटके में जिस तरह सिर्फ एक घंटे तक सैटेलाइट लिंक को डिस्टर्ब किया गया जिससे कोई भी मास्टरस्ट्रोक कार्यक्रम ना देखे और सैटेलाइट डिसटर्ब करने की जानकारी भी चैनल खुले तौर पर अपने दर्शको को बताने की हिम्मत न दिखाये।

विज्ञापन देने वालों के उपर दवाब बनाकर जिस तरह विज्ञापन भी रुकवा दिया गया उसकी मिनट-टू-मिनट जानकारी तो एबीपी न्यूज़ चैनल के भी पास है!

इसका पटाक्षेप न्यूज चैनल के संपादक को हटाने से किया गया और उसके 24 घंटे के बाृद मास्टरस्ट्रोक कार्यक्रम देखने वाले एंकर को भी हटाया गया! उसके बाद कैसे सब कुछ न सिर्फ ठीक हो गया यानी सैटेलाइट लिंक खराब होना बंद हो गया, विज्ञापन लोट आये और चैनल की माली हालत में भी काफी सुधार हो गया!

एडिटर्स गिल्ड हो या प्रेस काउसिंल या न्यूज चैनलो की संस्था नेशनल ब्राडकास्टिग एसोसिएशन, किसी ने भी कोई पहल तो दूर खामोशी इस तरह ओढ़ी कि यह सिलसिला देश में अलग अलग तरीके से लगातार जारी है

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