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2030 तक भारत चन्द्रमा की दुर्लभ हीलियम-3 से बनाने लगेगा बिजली

2030 तक भारत चन्द्रमा की दुर्लभ हीलियम-3 से बनाने लगेगा बिजली

भले ही भारत का चन्द्रयान -दो की अपेक्षित सफलता अभी भी संदिग्ध हो पर  भारत इस चन्द्र मिशन पर एक हजार करोड़ रुपए यूं ही नहीं झोक रहा और इस तरह कई हजार करोड़ रुपए वो अगले अभियानों पर भी खर्च करने को तैयार है.

दरअसल चन्द्रमा के हीलियम तीन पर भारत ही नहीं अमेरिका और चीन की भी नजर है और सभी अपने-अपने तरीके से इसका हिस्सा जल्दी से जल्दी हासिल करने की कोशिशों में लगे हैं क्योंकि न सिर्फ यह धरती पर बिजली की जरूरतें पूरा करने का सबसे सस्ता विकल्प है बल्कि इसके इस्तेमाल से रेडियोएक्टिविटी के विकरण का कोई खतरा नहीं है यानि बिजली तो मिलेगी और रूस के चेरनोबिल जैसे भयंकर कांड का खतरा भी नहीं है.

वैसे तो सूरज अपने सौर तूफानों के जरिए लगातार हीलियम तीन को लगातार झोंकता रहता है पर धरती पर मौजूद गुरुत्वाकर्षण और हवाओं के कारण या तो ये गैस हमारे वायुमंडल में प्रवेश ही नहीं कर पाती या प्रवेश कर भी लेती है तो टिक नहीं पाती और यही वजह है कि यहां यह अति सूक्ष्म मात्रा में उपलब्ध है और लगभग चालीस हजार डालर प्रति आउंस के भाव पर बिकती है.

अगर भारत चन्द्रमा पर हीलियम के खनन का सिस्टम बनाने में कामयाब होता है तो देश की साल भर की बिजली जरूरतें पूरा करने के लिए  केवल बीस टन ही हीलियम -3 गैस पर्याप्त होगी और अभी के आंकलन के अनुसार इतनी हीलियम गैस को चन्द्रमा से धरती पर लाने के लिए कोई तीन अरब डालर के आसपास का खर्चा आएगा.

भारत चन्द्रमा से इस गैस को ढोकर लाना चाहता है इससे देश का वैज्ञानिक तबका का परिचित है पर इसे हाल ही में भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन के पूर्व वैज्ञानिक सिवाथानू पिल्लई ने यह कहकर हवा दे दी कि भारत अगले दस सालों में चन्द्रमा की हीलियम तीन का इस्तेमाल अपने रियेक्टरों में करने लगेगा.

येे वही वैज्ञानिक हैं जिनके नेतृत्व में भारत ने ब्रह्मोस मिसाइल डिजाइन की है और दूरदर्शन के एक कार्यक्रम में उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के इस आर्थिक पक्ष का खुलासा इसी हफ्ते किया है.

दरअसल चांद की मिट्टी में प्रचुर मात्रा में हीलियम मौजूद है और उसे निकालने के लिए इस मिट्टी को एक हजार डिग्री सेंटीग्रेट तक गर्म करना पड़ेगा जिसके लिए एक फैक्टंरी जैसा सेटअप बनाने की जरुरत पड़ेगी.

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