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आरएसएस रजिस्टर्ड है तो उसे छिपाती क्यों हैं ?

आरएसएस रजिस्टर्ड है तो उसे छिपाती क्यों हैं ?

आरएसएस यानि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बारे में सभी यही मानते रहे हैं कि वो एक गैरपंजीकृत संस्था है जिस पर देश में संगठन या एनजीओ के लिए बने कोई नियम लागू इसलिए हो ही नहीं सकते क्योंकि उसने खुद को उस दायरे से बहुत अलग रखा हुआ है पर यह जानकारी अधूरी है क्योंकि संघ महाराष्ट्र के एक जिले में बाकायदा पंजीकृत है भले ही उसने इस सच्चाई को छुपाकर रखा हुआ है क्योकि बिना पंजीकरण वाली संस्था का जो फायदा अब तक वह उठाती रही है उससे वो मरहूम नहीं होना चाहती.

आरएसएस पंजीकृत है इसका खुलासा तब हुआ जब महाराष्ट्र के पूर्व पार्षद और वकील जनार्दन मून ने सितम्बर 2019 में चांदपुर के पब्लिक ट्रस्ट रजिस्ट्रेशन आफिस में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ  के नाम से अपनी एक संस्था को पंजीकृत कराने की कोशिश की.

इन महाशय का दावा था कि आरएसएस कोई पंजीकृत नाम नहीं है इसलिए इस नाम को अपने खाते में करने का उन्हें कानूनी अधिकार है पर संघ की तरफ से राजेन्द्र गुंडलवार नाम के वकील ने दस्तावेजों के साथ पेश होकर दावा किया कि आरएसएस पहले से पंजीकृत  संस्था है इसलिए कोई भी शख्स इस नाम पर दावा नहीं कर सकता.

उन्होेने उस समय जो दस्तावेज पेश किए उसके अनुसार संघ का रजिस्ट्रेशन नम्बर 08-डी 0018394 और डिजिटल रजिस्ट्रेशन कोड 94910 है.

संघ के पंजीकरण प्रमाण पत्रों की जो खबरें उस 2017 के सितम्बर में महाराष्ट्र समेत गिने चुने नागपुर टुडे  जैसे अखबारों मेंं लगी हैं उसके अनुसार संघ को यह प्रमाणपत्र सोसायटी पंजीकरण कानून 1950 के तहत जारी किया गया है लेकिन इसके बाद इतना ही पता है कि यह पंजीकरण कानूनी दांवपेचों में उलझ गया और फिर इसका क्या हुआ कुछ पता नहीं.

27 सितम्बर 1925 को गठित आरएसएस इस समय दुनिया  का सबसे बड़ा स्वंयसेवी संगठन  माना जाता  है और इस संस्था की अपनी वेबसाइट में दावा किया गया है कि  इसके एक करोड़ से ज्यादा सदस्य हैं भले ही यहां सदस्यों का न तो पंजीकरण होता है और न ही उनका कोई रिकार्ड रखा जाता है.

फिर खुद को यह पंजीकृत संस्था बताने से परहेज शायद वह इसीलिए करती है क्योंकि उसकी सफलता का सबसे बड़ा राज़ भी यही है कि वो अपंजीकृत संस्था है जो देश के  कानूनों के दायरे में काम करने से मुक्त है.

आरएसएस का देश भर में जबरदस्त नेटवर्क है और अब तो कोई ऐसा शहर नहीं है जहां उसकी शाखाएं न लगती हों और मोदी सरकार के देश की सत्ता के केंद्र में आने के बाद तो इन शाखाओं मेंं दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोत्तरी हुई है पर आज भी संघ का देश में कहीं बैंक खाता नही है और न ही वो अपने सदस्यों से किसी तरह का चन्दा लेती है मतलब आय-व्यय का हिसाब किताब दिखाने के लिए आडिट की व्यवस्था से वह मुक्त है.

उसकी विदेशोे में शाखाएं जरुर हैं पर वह विदेशों से चन्दा नहीं लेती यानि फेरा  समेत  विदेशी मुद्रा विनमय कानून जिसका शिकार देश के तमाम बड़े बड़े एनजीओ होते रहे हैं वो उससे भी मुक्त है और विदेशी चंदा लेने के लिए उसने लाइसेंस लिया ही नहीं है तो उसे रद्द किए जाने के डर से भी वो आजाद है.

संघ की आर्थिक व्यवस्था यह है कि वो गुरुपूर्णिमा या ऐसे ही आयोजनों पर स्वंयसेवको से बंद लिफाफे में गुरु दक्षिणा लेती है पर इसका भी हिसाब किताब कभी घोषित  नहीं हुआ और हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए काम करने वाली इस संस्था का ताना बाना यह है कि ज्यादातर आयोजनों में कार्यकर्ताओं के घरों पर यह उनकी ही जिम्मेदारी पर किए जाते हैं जिससे संस्था को लेकर कोई सवाल उठाया भी नहीं जा सकता.

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