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दंगोंं  में मोदी की भूमिका पर सवाल उठाए शीर्ष सैन्य अफसर ने

दंगोंं में मोदी की भूमिका पर सवाल उठाए शीर्ष सैन्य अफसर ने

भारतीय सेना के उप प्रमुख के पद से रिटायर होने वाले जमीरुद्दीन शाह ने अपनी नई किताब सरकारी मुसलमान में गुजरात दंगों को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के रुख पर फिर सवालिया निशान लगा  दिया है.

इस  किताब का विमोचन इसी महीने 13 अक्टूबर को पूर्व राष्ट्रपति हामिद अंसारी करने जा रहे हैं और इसमें उन्होंने पूरी कमान के साथ दंगों पर नियंत्रण करने के लिए भेजे जाने पर  अपने अनुभवों को साझा किया है.

इसी किताब के कुछ अंश अहमदाबाद मिरर ने छापे हैं जिसमें कहा गया है कि तीन हजार जवानों की सैन्य टुकड़ी  के साथ अहमदाबाद पहुंचने पर उन्होंने तुरंत ही तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलने की इच्छा जाहिर की और दोपहर दो बजे उस समय के रक्षा मंत्री जार्ज फर्नान्डीज की मौजूदगी में उन्हें दो बजे मिलने का समय दिया गया.

इस मुलाकात में उन्होंने सेना की तरफ से अपनी जरुरते बताई पर मुख्यमंत्री का रुख खासी  बेरुखी वाला  था और सुबह सात बजे उतरी सेना को चौबीस घंटो से ज्यादा का समय हवाई अड्डे पर ही बिताना पड़ा क्योकि उसे वाहन ही उपलब्ध नहीं कराए गए जबकि इसी दौरान सैकड़ो लोग मार दिए गए.

अपने संस्मरण लिखते हुए वो कहते हैं कि गुजरात सरकार ने 28 फरवरी 2002 को दंगों से निपटने के लिए सेना की मदद मांगी थी और चीफ आफ आर्मी स्टाफ जनरल पद्मनाभन ने वायुसेना के विमानों से उन्हें तुरंत अधिकतम फोर्स के साथ गुजरात पहुचने के निर्देश दिए और  वे सभी पहली मार्च की सुबह  सात बजे अहमदाबाद पहुंच भी गए पर दंगागस्त शहर की कमान सम्भालने का मौका उन्हें दो मार्च को दिया गया और तब तक जान माल का अस्सी फीसदी से ज्यादा नुकसान हो चुका था.

जनरल शाह कहते है कि इसके बावजूद मात्र 48 घंटे में सेना ने दंगे पर काबू पा लिया जबकि वह स्थानीय पुलिस से संख्या बल में बहुत ही कम थी.

परम विशिष्ट सेवा मेडल, सेना मेडल और विशिष्ट सेना मेडल से सम्मानित इस अफसर का कहना है कि हालांकि उनका मकसद किसी पर आरोप लगाना नहीं है पर उन्होंने  खुद देखा कि सत्तारुढ़ दल के विधायक पुलिस स्टेशनों में बैठे रहते थे जबकि उनकी वहां कोई जरुरत नहीं और शायद पुलिस भी इसी वजह से चाहकर भी छह दिनों में दंगों पर काबू नहीं कर पा रही थी.

हालांकि सरकार द्वारा 2005 में लोकसभा में दिए गए आंकड़ों के अनुसार गुजरात दंगो में 790 मुस्लिम और 254 हिन्दू मारे गए थे और 223 लोग लापता थे जबकि ढाई हजार से ज्यादा घायल हुए थे पर इस अफसर का कहना है कि असली तस्वीर इन आंकड़ों से नहीं समझी जा सकती और इसके राजनीतिक एंगल पर बात करके वो पुराने जख्म भी ताजा नहीं करना चाहते.

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