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कहीं मोदी सरकार के लिए भी खतरे की घंटी तो नहीं है प्याज के बढ़ते हुए दाम…

कहीं मोदी सरकार के लिए भी खतरे की घंटी तो नहीं है प्याज के बढ़ते हुए दाम…

इतिहास गवाह है कि प्याज को जब भी अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन करना होता है तो वो ठीक उसी तरह मंहगा होना शुरु हो जाता है जैसे इन दिनों हो रहा है.

वैसे भी पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की विदाई में भी तमाम दूसरे मुद्दों के साथ प्याज की भूमिका रही है और प्याज ने नब्बे रुपए किलो  का दाम छूकर उस समय की सरकार को परेशान कर डाला था तो प्याज की मालाएं और प्याज की पगड़ी बांधकर भाजपा नेताओं ने मोदी सरकार की ताजपोशी का माहौल बनाना शुरु कर दिया था.

देश के कई इलाकों में सौ से डेढ़ सौ रुपए प्रति किलो तक की कीमत छू रहा प्याज भले जनता को इस समय रुला रहा हो पर इसके असर के खौफ से तो जरुर मोदी सरकार भी कांपी हुई है इसीलिए जब प्याज की कीमतें काबू में रखने की उसकी सारी घरेलू कोशिशें नाकाम हो गई तो अब वो दूसरे देशो के बाजारों से प्याज खरीदकर ही सही उसके दाम किसी तरह काबू में रखना चाहती ताकि प्याज कहीं एक बार फिर 1980 की तरह कांग्रेस को सत्ता में वापस लाना का जरिया न बन जाए.

फिलहाल मिस्र से छह हजार टन और टर्की से 11 हजार टन प्याज मंगा तो लिया गया है पर वो अभी देश मे पहुंचा नहीं और एक बार भारतीय बाजारों में पहुंचने के बाद वो मोदी सरकार की परेशानी कम करता भी है या नहीं ये देखने के लिए तो कम से कम 15 जनवरी तक का इंतजार करना भी पड़ेगा.

प्याज के बिना भारतीय रसोइयों में शायद रोज खाना बनना सम्भव ही नहीं है इसीलिए इस प्याज को अपनी राजनीतिक ताकत का अंदाजा तब से हो गया था जब उसकी कीमत मात्र पांच रुपए  प्रति किलो हुआ करती थी.

युवाओं को भले पता न हो पर पुरानी पीढ़ी को तो याद ही होगा कि आपातकाल के बाद हुए चुनावों में बेइज्जती के साथ सत्ता से बेदखल हुई पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की फिर से ताजपोशी इसी प्याज ने कराई थी और तब प्याज के दाम पांच रुपए किलो हो गए थे.

1980 में तत्कालीन जनता पार्टी सरकार के खिलाफ चुनावों में प्याज की मंहगाई के कारण ही इंदिरा लाओ- देश बचाओ का नारा जोर शोर से लगाया गया था और इस नारे ने इतना असर दिखाया था कि जनता ने मान लिया था कि अगर इंदिरा नहीं आईं तो प्याज के दाम नहीं घटेंगे और देश खतरे में चला जाएगा.

लेकिन इसी प्याज ने एक साल बाद स्वर्गीय इंदिरा गांधी को भी रुलाना शुरु कर दिया था जब प्याज के दाम पांच रुपए से भी बढ़कर छह रुपए किलो तक पहुंच गए थे पर यह उऩका तख्ता पलट करता इसके पहले ही उनकी हत्या हो गई और सहानुभूति के कारण राजीव गांधी की देश में सरकार बन गई.

प्याज ने अपनी ताकत का प्रदर्शन एक बार फिर दिखाकर उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी को जमकर परेशान किया था औ तब उसके दाम बढ़कर 45 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए थे.

ऐसे में पहली बार देश में प्याज की चोरी शुरू हुई थी और लोगों ने दीवाली में भेंट के तौर पर प्याज को देना शुरू कर दिया था और कांग्रेस नेता छगन भुजबल ने तो उस समय के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री मनोहर जोशी को प्याज का गिफ्ट बाक्स ही दे डाला था.

यही नहीं दिल्ली और राजस्थान में भाजपा पांच रुपए प्रति किलो की दर से प्याज बिकवाने के वायदे के साथ सत्ता में आई थी और दोनों ही जगहों पर ऐसा कर पाने में फेल रहने पर सत्ता से बाहर हो गई थी.

 

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