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अभी भी समय है, कांग्रेस  सीख ले भाजपा से चुनाव लड़ने का गुर

अभी भी समय है, कांग्रेस सीख ले भाजपा से चुनाव लड़ने का गुर

इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश की साढ़े तीन सौ से  ज्यादा सीटो पर एक  साथ चुनाव लड़ रहे नरेन्द्र मोदी के सामने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी न सिर्फ बचकाने साबित हुए हैं बल्कि  यह कहने में भी गुरेज नहीं किया जाना चाहिए कि कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व को चुनाव लड़ने के गुर भाजपा  से सीखने चाहिए.

आश्चर्य की बात है कि इस चुनाव में कद्दावर नेताओं समेत सौ से ज्यादा जीते हुए नेताओं के टिकट काट देने के बाद भी भाजपा में कोई बगावत नहीं होती और कार्यकर्ता नेताओं  की बजाए   पार्टी को जिताने के लिए उतनी ही शिद्दत से जुटे रहते हैं वहीं कांग्रेस जिन तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव जीतकर सरकार बनाती है वहां भी वर्चस्व की  लड़ाई के चलते स्थानीय राजनीति और गुटबाजी का ऐसा शिकार होती है कि आम चुनावों में सूपड़ा साफ होने जैसी स्थिति में पहुंच जाती है.

अब से एक दशक पहले कांग्रेस का कार्यकर्ता कांग्रेसी होने के जिस गुमान  में जीता था आज उस  सोच पर भाजपा का कब्जा है और कांंग्रेस का का कार्यकर्ता जहां कांग्रेसी कहलाने से दूर हो चुका है वही भाजपाई कहलाना गौरव का प्रतीक बन चुका है.

कांग्रेस और भाजपा की चुनावी रणनीति पर ध्यान दें तो एक फर्क  साफ नजर आता है कांग्रेस जहां पुराने तौर  तरीकों  से कुछेक आंकड़ो और आरोपोे को बार बार दोहराकर किसी चमत्कार की तरह राजनीतिक परिणाम अपने पक्ष में आने की उम्मीद के सहारे रही तो भाजपा ने हर राज्य के लिए जीत का जो आंकड़ा तय  किया उसे हासिल करने के लिए जायज हो या नाजायज हर तरीके की रणनीति बनाकर उसे हासिल करने में जुटी रही क्योंकि वह मानती है कि जीत जाने के बाद किसी भी तरह के सवालोंं का कोई मतलब नहीं होता.

भाजपाई विश्लेषक भले दावा करें कि ये मोदी सरकार के  कामकाज की जीत है पर ऐसा नहीं है कि जनता में  केंद्र सरकार के कामकाज को लेकर कोई असंतोष नहीं था  पर न सिर्फ कांग्रेस बल्कि ज्यादातर क्षेत्रीय दल कोई भरोसेमंद चेहरा और कार्यक्रम देने में नाकाम रहे जिससे मोदी का विकल्प  मिला ही नहीं.

इस स्थिति के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा और मजबूत सरकार का जो दांव मोदी ने खेला वह निश्चितरुप से जनता के सिर चढ़कर बोला.

भाजपा की वाहवाहकारी के बीच यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह देश का पहला ऐसा चुनाव रहा जहां न सिर्फ राहुल गांधी बल्कि खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाषाई मर्यादाओं से बहुत नीचे जाकर यह चुनाव लड़ा और देश  का चुनाव  आयोग एक साफ सुथरा चुनाव कराने में जबरदस्त नाकामी के लिए हमेशा याद रखा जाएगा जिसके अपने भीतर के मतभेद भी उभरकर सड़क पर आ गए.

भाजपा की चौतरफा सफलताओं और  कांग्रेस की नाकामियों के बाद यह भी  इन चुनावों ने साफ कर दिया कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का कांग्रेस मुक्त भारत का नारा अभी दूर का सपना है और अगर कांग्रेस इस चुनाव में भले ही मामूली तौर पर बढ़ी हो पर बढ़ी तो है ही और जाग जाने की यह जुम्बिश अगर आगे बढ़ती है तो भाजपा से मुकाबले के लिए वो ही मुख्य दावेदार की तरह अगले दो-चार सालों में आ सकती है.

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