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भाजपा नहीं अभी तो कांग्रेस पर बहस में उलझी है माकपा

भाजपा नहीं अभी तो कांग्रेस पर बहस में उलझी है माकपा

फासिस्टी भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस का साथ कैसे लिया जाए अभी तो वामपंथ में खुद को बड़ा भाई  मानने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी इसी बहस  में उलझी है क्योंकि पार्टी की शीर्ष संस्था पालिट ब्यूरो इसे लेकर पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी और पूर्व महासचिव प्रकाश करात की अलग अलग राय को लेकर दो खेमों में बंटा हुआ है.

बहरहाल मीटिंग पर मीटिंग हो रही है और यह सैद्धांतिक बहस खत्म होने का नाम नहीं ले रही है अब इसे पालिट ब्यूरो से निकालकर पार्टी की विस्तारित सेंट्रल कमेटी की बैठक में रखे जाने की तैयारी जहां शायद छह अक्टूबर के बाद कोई रणनीति अंतिम रुप से तय की जा सके.

दरअसल सारा विवाद इस बात को लेकर है कि भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस के साथ  राजनेतिक समझदारी किस तरह कायम की जाए और क्या फासिस्टी भाजपा को हराने के लिए सामंती-अधिनायकवादी कांग्रेस का हाथ पकड़ना बड़ा खतरा नहीं होगा.

इस बारे में सीताराम येचुरी की राय साफ है कि भाजपा अपनी फासिस्टी सोच को जिस तरह पूरे देश में फैलाती जा रही है उससे मुकाबले के लिए माकपा को कांग्रेस से राजनीतिक और चुनावी समझदारी कायम करने में बहुत परहेज नहीं होना चाहिए जबकि प्रकाश करात और माकपा शासित अकेले केरल राज्य के नेताओं का मानना है कि कांग्रेस से किसी तरह का रिश्ता कायम करना पार्टी के हैदराबाद  में हुई 22 वीं कांग्रेस में पारित राजनीतिक प्रस्ताव का अपमान होगा.

ऐसा नहीं है कि ये नेता भाजपा को हराने के पक्ष में नहीं हैं पर इनका कहना है कि इसके लिए कांग्रेस की उंगली पकड़ने की कोई जरुरत नहीं है.

यह सैद्धांतिक विवाद इसलिए पैदा हो रहा है क्योंकि पार्टी ने हैदराबाद कांग्रेस में अपने पुराने राजनीतक प्रस्ताव में कांग्रेस के साथ चुनावी साझेदारी और गठबंधन  कायम न करने जैसे शब्दों को बदलकर अब लिख दिया है कि कांग्रेस के साथ राजनेतिक गठबंधन न करना लिख दिया है जिसकी एक गुट व्याख्या कर रहा है कि स्टैटिजिक अलायंस किया जा सकता है जबकि दूसरा गुट कह रहा है किसी तरह का कोई रिश्ता घातक होगा.

बहस इतनी तीखी है कि दक्षिण के कुछ राज्यों में जहां सहयोगी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी स्थानीय क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के  साथ तालमेल कर चुकी है तो माकपा ने वहां भी यह फैसला स्थानीय स्तर पर छोड़कर कोई केंद्रीय नजरिया अख्तियार नहीं किया है,

अब जबकि आम चुनाव में कुछ महीने ही बचे हैं अच्छा है कि लम्बी बहस के बाद पार्टी इस बहस से जितनी जल्दी हो सके उबर जाए क्योंकि ज्यादा लम्बी बहस कहीं वामपंथ की जमीन को देश में और छोटी न कर दे.

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