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चुनावों मे फिर काले धन का बोलबाला, अब तो मोदी सरकार ने जायज भी कर दिया

चुनावों मे फिर काले धन का बोलबाला, अब तो मोदी सरकार ने जायज भी कर दिया

काले धन के जिस शोर को हथियार बनाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पांच साल पहले सत्ता की थामी थी इन चुनावों में वो उसी काले धन को जायज करार दे चुके हैं और यही वजह है कि हमारा ये चुनाव अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव से भी मंहगा साबित होने जा रहा है.

अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव जहां साढ़े छह बिलियन डालर में निपट गया था वहीं हमारा यह चुनाव कम से कम आठ बिलियन डालर का बैठेगा यानी… औसतन तीन डालर में दिन काट देने वाले हर भारतीय के एक वोट की कीमत कोई आठ डालर की बैठेगी.

वैसे सरकारी आंकड़ों में तो ये चुनाव चार हजार करोड़ में निपट जाएंगे क्योंकि उन्हें इसमे काले धन की रकम को शामिल थोड़े ही करना है और चुनाव मंहगे से मंहगा होता जाए लगता है इसकी सायास कोशिश है शायद इसीलिए एक प्रत्याशी के चुनाव खर्च की तो सीमा तय है पर पार्टियां कितना रकम खर्च करेगे इसे सीमा में बांधने के पक्ष में कोई दल नहीं है.

पचास हजार करोड़ के इस चुनाव में पार्टियां जो रकम खर्च करेगीं उसका अस्सी फीसदी तो अघोषित श्रोतों से ही आएगा और वैसे भी ये पहला चुनाव है जिसमें काले धन को सफेद करने और फिर राजनीति को अपनी उंगलियों पर नचाने के लिए इलेक्टोरल बांड भी मौजूद है यानि पार्टियों को अब न तो चुनाव आयोग को बीस हजार से कम मिले चंदे के बारे में बताना है और न हीं बैंकों से खरीदकर चुपचाप उन्हें सौंपे गए चुनावी बांडो के बारे चुनाव आयोग या किसी भी और एजेंसी को बताना है और जाहिर है इसका 95 फीसदी तक  फायदा भाजपा उठा रही है.

भाजपा  इस चुनाव के लिए अघोषित श्रोतों से पांच सौ करोड़ के आसपास की रकम जुटाने के करीब है जबकि कांग्रेस 120 करोड़ पर ही अटक जाएगी.

अजीब बात है कि चुनावो में काले धन को बढ़ावा वही पार्टी दे रही है जो कालेधन से चिढ़ने का सबसे ज्यादा ढोंग करती रही है और अब चुनावोंं मे उसका इस्तेमाल बना रहे इसके लिए बाकायदा सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा लड़ रही है.

चुनाव आयोग ने तो सुप्रीम कोर्ट में इसी साल मार्च मे हलफनामा दाखिल करके मोदी सरकार के इस दावे को खारिज कर दिया है कि इलेक्टोरल बांड  को चुनाव सुधार कहा भी जा सकता है और उसकी दलील है कि ये  तो चुनावी फंड की  पारदर्शिता पर सबसे गम्भीर चोट है.

आश्चर्य है कि जिस मीडिया को इस ऱाजनीतिक घपलेबाजी की साजिश जनता तक शिद्दत से पहुचानी चाहिए थी वह तो भाजपा के सेट किए एजेंडे हिन्दू मुस्लिम और राष्ट्रवाद में ही उलझी रही.

इसी तरह किस पार्टी को विदेश से कितना चंदा मिला है और उसकी शुक्रगुजारी में वो विदेशी दोस्त की क्या मदद करने जा रहा है ये भी अब कोई नहीं जान सकता क्योंकि सरकार ने चुपके से फारेन कंट्रीब्यूशन एक्ट भी पिछले साल संशोधित कर दिया है वह भी तब जब फेरा के तहत विदेशी चंदा लेने में देश की दोनो बड़ी पार्टियां भाजपा और कांग्रेस 2010 के के मामले में फंस गई थी.

इस मामले में दोनो राजनीतिक प्रतिद्वन्दी किसी पक्के दोस्त की तरह नजर आए और मोदी सरकार के दूसरे बिल राज्यसभा में अटका देने वाली कांग्रेस ने भी इसे खामोशी से पास कर दिया और यही नहीं ये कानून बैक डेट से लागू किया गया  है.

दरअसल काला धन कामयाबी की सीढ़िया राजनेताओ की मदद से ही चढ़ता है और इसीलिए हर चुनाव में सैकड़ो करोड़ की नकदी, शराब, वगैरह जब्त करने की खबरे आती हैं और इस चुनाव में भी उनकी धमाकेदार शुरुआत हो चुकी है. अभी हाल ही में हुए एक स्टिंग आपरेशन में उदित राज, पप्पू यादव समेत एक दर्जन सांसदो ने माना कि उन्होंने हर बार की तरह इस बार भी करोड़ो रुपए जनता में वोट के बदले बांटने शुरू कर दिए हैं .

यानि आज का चुनाव भले गरीब आदमी के नाम पर लड़ा जा रहा हो परआम आदमी में अब चुाव लड़ने की हिम्मत नहीं है क्योंकि पैदल घूमने से वोट नहीं मिलते और ग्लैमर का ऐसा लबादा हम पर छा चुका है कि जब तक कारों का काफिला न हो, नारे लगाने वालों का हुजूम न हो हमे कोई नेता ही नहीं लगता और किसी से हम ये पूछने की जरूरत भी नहीं समझते कि चुनाव में खर्च करने के लिए इतने रुपए उसके पास आए कहां से.

चुनावों को सस्ता बनाने के विकल्प है पर ये राजनेताओं को सूट नहीं करता और जनता को इसका चिन्ता ही नहीं है

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