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सुप्रीम कोर्ट के सामने बौना हुआ महाराष्ट्र के राज्यपाल का भी कद

सुप्रीम कोर्ट के सामने बौना हुआ महाराष्ट्र के राज्यपाल का भी कद

भले ही राष्ट्रपति की तरह राज्यपालों को संविधान दलगत राजनीति से ऊपर मानकर उनके फैसलों की न्यायिक समीक्षा की मनाही करता हो पर इधर राज्यपालों पर अपनी दलीय प्रतिबद्धताओं से वशीभूत होकर काम करने के आरोप लगातार लगते रहे हैं.

ताजा मामला अब महाराष्ट्र के राज्यपाल के उस फैसले पर सामने आया है जिसमें शायद फौरी आंकलन करके उन्होंने राज्य में  भाजपा की सरकार बनवाकर देवेन्द्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस के बागी अजित पंवार को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी.

रविवार को सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की बेंच ने विशेष सुनवाई करते हुए केंद्र और महाराष्ट्र सरकार को आदेश जारी करके राज्पाल का आमंत्रण पत्र और फड़नवीस द्वारा राज्यपाल को सौंपे गए विधायकों के समर्थन पत्र को सोमवार सुबह साढ़े दस बजे से होने वाली सुनवाई में तलब कर लिया है.

केंद्र और महाराष्ट्र सरकार की ओरे से पैरवी कर रह सरकारी वकील की इस दलील पर शीर्ष अदालत ने कोई ध्यान नहीं दिया कि संविधान के अनुसार किसे मुख्यमंत्री बनाना है ये राज्यपाल का अधिकार है और किसी अदालत में राज्यपाल के फैसले के खिलाफ सुनवाई नहीं हो सकती.

शिवसेना के वकील और कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस और शिवेना के मुकदमें की पैरवी करते हुए कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एन वी रामना की अध्यक्षता में बनी तीन जजो की बेंच से कहा कि बिना केंद्रीय कैबिनेट की बैठक बुलाए शाम 5.47 बजे न सिर्फ महाराष्ट्र से राष्ट्रपति हटा लिया जाता है बल्कि केंद्र के इशारे पर काम करते हुए राज्यपाल मात्र तीन घंटे में मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री को शपथ भी दिला दी.

उन्होंने कोर्ट से आज रविवार को ही विधानसभा में शक्ति परीक्षण कराने की मांग की ताकि ये सरकार फ्लोर टेस्ट में गिर जाए.

उन्होंने बताया कि का कांग्रेस शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस के बीच कार्यक्रम के आधार पर सहमति बन चुकी है और ये भी तय हो चुका है मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ही बनेगें.

कांग्रेस के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि राज्यपाल ने राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता के तौर पर अजीत पंवार को पहचाना है जबकि ये पार्टी तो कांग्रेस के साथ है और हम नहीं जानते कि अजीत कैसे राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता हो सकते हैं.

उनका कहना है कि गोवा और उत्तराखंड की तरह महाराष्ट्र के राज्यपाल भी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता की तरह काम कर रहे हैं.

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