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संघ का एजेंडा पूरा पर बेमतलब था नागपुर में प्रणब मुखर्जी का भाषण

संघ का एजेंडा पूरा पर बेमतलब था नागपुर में प्रणब मुखर्जी का भाषण

नागपुर में प्रणब मुखर्जी ने जो कुछ कहा वह न तो याद रखने लायक है और न ही याद रखा जाएगा पर संघ ने हर नजरिए से अपना एजेंडा पूरा कर लिया.

भले ही कांग्रेस के कुछ नेता अब सार्वजनिक रूप से कह रहे होॆ कि संघ मुख्यालय जाकर पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इस हिन्दू संगठन को आइना दिखा दिया पर उनके भाषण से कहीं यह नहीं लगा ये वही प्रणब मखर्जी हैं जिन्होंने केंद्रीय मंत्री रहते हुए संघ के खिलाफ भगवा आतंकवाद (सैफ्रन टेरर) जैसा शब्द गढ़ा था.

कुल मिलाकर प्रणब मुखर्जी का पूरा भाषण सुनकर तो यही लगा कि कम से कम ये पहले वाले प्रणव  मुखर्जी तो नहीं है और अब वे काफी हद तक उसी तरह सोचते हैं जैसा संंघ सोचता  है- वो देश के संविधान में सबको समान तो बताने की हिम्मत करते हैं पर मुगलों को संघ की तरह आक्रमणकारी कहने से  उन्हें कोई परहेज नहीं हैं क्योंकि संंघ इसे पसन्द करता है.

यही  वजह है कि आज सोशल मीडिया पर यह बताने की कोशिश की जा रही है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत और प्रणव मुखर्जी की सोच में कोई बड़ा मतभेद नहीं है.

वहीं कांग्रेस और धर्मनिरपेक्षता में भरोसा करने वाले पूर्व राष्ट्रपति के भाषण में बिटविन द लाइन्स वो चीजें ढूंढने में लगे हैं जिससे यह लगे कि उन्होंने संघ को उसके राष्ट्रवाद पर आईना दिखाने की कोशिश की जबकि सच्चाई यह है  कि राष्ट्रवाद और भारत के पांच हजार साल के इतिहास पर प्रणब मुखर्जी ने जो कुछ कहा वह एक अच्छे विद्यार्थी द्वारा दिए जाने वाले भाषण से बेहतर हर्गिज नहीं है और उस पर भी उन्होंने इस बात  का पूरा ख्याल रखा कि वो कुछ ऐसा न कहें जो संघ के लोगों को नागवार लगे और शायद इसीलिए उन्होंने संघ के सोच  की संकीर्णता पर इशारों में भी कोई सवाल  नहीं किया.

यानि संघ मुख्यालय जाकर प्रणब मुखर्जी यह भूल गए कि संघ  की विचारधारा को देश की एक बड़ी आबादी आज भी संदेह की नजर से देखती भले ही वो गलत हो पर पूर्व राष्ट्रपति संघ को इशारों में यह बात तो कह ही सकते थे.

अगर देखा जाए कि संघ को अपने प्रचारकों  को दीक्षित करने के इस  कार्यक्रम में प्रणब मुखर्जी को बुलाकर क्या मिला तो यह इसी से समझा जा सकता है कि अपने कार्यक्रमों में  संघ हमेशा से उन लोगों  को बुलाता रहा है जो उसके प्रबल आलोचक रहे हों और इसके फायदे उन्हें पहले भी  मिलते रहे हैं.

संघ के कार्यक्रम में प्रणब मुखर्जी ने गणवेश नहीं पहना, संघ प्रणाम नहीं किया कांग्रेस इससे ही खुश हो जाए पर यह भी सही है कि जिस संघ ने महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल और जय प्रकाश नारायण की नहीं सुनी वह बिना कुछ कहे प्रणब मुखर्जी की सदाश्यता से बदल जाएगी यह सोचना ही दिवा-स्वप्न देखने जैसा है

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