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रिकार्ड रकम डुबोकर टूट जाएगी सरकारी बैंकों की रीढ़ पर मस्त है मोदी सरकार

रिकार्ड रकम डुबोकर टूट जाएगी सरकारी बैंकों की रीढ़ पर मस्त है मोदी सरकार

बैंकिंग इतिहास की सबसे बड़ी रकम डुबोकर सरकारी बैंक खुद भी  डूबने की  कगार तक पहुंच गए हैं पर अभी भी लोगों को सुनहरे सपने में दिखाने में मोदी सरकार अभी भी मस्त है.

हालत  यह है कि भारतीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी के ताजा आंकड़ों के अनुसार सिर्फ 2018 में ही  बैंकों  का एक लाख चव्वालीस करोड़ रुपया डूब चुका है जो दस सालों के बैंकिंग इतिहास में सबसे बड़ी रकम है और इसमे से 85 फीसदी रकम सरकारी बैंकोॆ की है और यह पिछले साल  डूबी हुई रकम का डेढ़ गुना है.

ध्यान देने की बात यह है कि इतनी बड़ी रकम एनपीए यानि बट्टेखाते में गई रकम नहीं है बल्कि यह रकम वो है जिसे बैंको ने साफ-साफ मान लिया है कि उनकी यह रकम डूब चुकी है और  उसकी वापसी की कोई गुंजाइश ही  नहीं बची है.

सरकारी बैंको द्वारा इतनी बड़ी रकम गंवा देने का सीधा छोटे उद्योगों और आम आदमी पर पड़ना तय है जिसे कर्ज देने के लिए बैंको के पास अब रकम ही नहीं होगी तो उसके खाते  में कर्जे के लिए बैंकों के जरुरत से ज्यादा चक्कर लगाना अपने आप  ही आ जाएगा.

दरअसल बैंक अपने यहां आम जनता की विभिन्न योजनाओं में जमा पूंजी पर जहां चार-साढ़े चार फीसदी ब्याज देते हैं वहीं अपनी उपलब्ध पूंजी को बड़े उद्योगपतियों को12 फीसदी या उससे भी ज्यादा ब्याज पर उधार  देते हैं और दोनो ब्याज के अंतर से  हुआ मुनाफा ही बैंकों की अर्थव्यवस्था  की  रीढ़ की हड्डी है.

इतनी बड़ी रकम डूब जाने के बाद कोई भी सरकारी बैंक है ऐसा नहीं है जिसकी तीस फीसदी पूंजी एनपीए यानि बट्टे खाते में न फंसी हो यानि वापस मिलने की उम्मीद जरूर बाकी है पर मिल ही जाएगी यह भरोसे से नहीं कहा जा सकता.

ऐसे में मोदी सरकार  का सिर्फ यह कह देना काफी नहीं है कि बैंकिंग उद्योग कठिन दौर से गुजर रहा है कि उसे यह भी बताना चाहिए कि उसकी लुभावनी योजनाएं जमीन पर कैसे उतरेंगी और आम आदमी खासकर लघु और मध्यम उद्योग कर्जा लेने कहां जाए.

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