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यूपी पुलिस का अमानवीय चेहरा तो पेश करती एक छोटी सी घटना

यूपी पुलिस का अमानवीय चेहरा तो पेश करती एक छोटी सी घटना

बनारस में महिला पुलिस प्रशिक्षार्थियों के सड़क पर उतर कर किए गए प्रदर्शन पर जिस तरह काबू पाया गया भले ही वो किसी को एक छोटी मामली घटना लगे पर यह तो छोटी सी घटना भी यह संकेत तो दे ही देती है कि जो पुलिस अपने कुनबे में शामिल हो रही लड़कियों को भी बंधुआ मजदूरों की तर्ज पर धमका सकती है उससे आम जनता को किसी मानवीय व्यवहार की अपेक्षा बहुत ज्यादा नही करनी चाहिए.

दरअसल आज सुबह बनारस में पुलिस का प्रशिक्षण ले रही कोई साढ़े तीन सौ लड़कियां पुलिस लाइन से बाहर निकलकर कचेहरी जाने वाली सड़क पर पहुंचकर धरने पर बैठ गईं.

प्रशिक्षण के लिए आई इन लड़कियों का आरोप था कि जिस  सुभाष छात्रावास में उन्हें रखा गया है वहां न तो सुरक्षा का इंतजाम है न रहने लायक न्यूनतम सुविधाएं है.

इन भावी पुलिस कर्मियों का कहना था कि दो दिन पहले कुछ गुंडे छात्रावास में घुस आए थे पर उसके बाद भी कुछ भी ऐसा नहीं किया गया जिससे लड़कियांं सुरक्षित महसूस करें.

यही नहीं छात्रावास में न तो बिजली पंखा है न पानी की व्यवस्था और खाना भी दूर स्थित मेस से लाइन लगाकर लाना पड़ता है.

बहरहाल लड़कियों के सड़क पर उतर जाने से बनारस के पुलिस प्रशासन का परेशान होना स्वाभाविक था और आनन फानन में बड़े अफसर मौकेे पर पहुंचे और उन्होंने लड़कियो की शिकायतों पर सुनवाई करके कदम उठाने की बजाए उन्हें धमकाया है कि वो ट्रेनिंग करने आई है कोई पिकनिक मनाने नहींं और ये परेशानियां भी ट्रेनिंग का ही हिस्सा है.

इन लड़कियों को यह धमकाया गया कि तुरंत अपने कमरों में नहीं लौटी तो अनुशासनहीनता में बर्खास्त कर दिया जाएगा.

जाहिर है आधी से ज्यादा ट्रेनिंग निपटा चुकी लड़कियों ने नौकरी न गंवाना ही बेहतर समझा पर यह जिस तरीके और माहौल में पुलिस अपने नए रंगरूटों को तैयार करती है उसकी बानगी तो पेश करती ही है.

व्यक्तिगत व्यहार छोड़ दें तो ट्रेनिंग के दौरान बेहतर स्थितियांं देना जिस पुलिस फोर्स के लिए जरूरी न हो उसके रंगरूट खास मौको पर सहृदयता से लोगों की परेशानियों से जुड़ेगे इसकी उम्मीद हमें तब तक नहीं करनी चाहिए जब तक यूपी पुलिस अपनी सोच में बुनियादी बदलाव करने को तैयार नहीं होती.

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