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मोदी सरकार में बहुत सांसत में है न्यायपालिका

मोदी सरकार में बहुत सांसत में है न्यायपालिका

टकराव और दबाव की राजनीति के कारण अब इस बात में कोई गुरेज नहीं है कि मोदी सरकार मे सचमुच देश की स्वतंत्र न्यायपालिका काफी दबाव महसूस कर रही है.

सच्चाई यह है  कि सर्वोच्च न्यायालय में जजों की नियुक्त का बरसों से चला आ रहा तरीका इस सरकार को मंजूर नही है और नया सिस्टम अभी तक बन नहीं पाया है जिससे नए जजों की नियुक्ति  में बार-बार सुप्रीम कोर्ट के शीर्षस्थ जजों की राय की अनदेखी की जाती है जिससे वो खुद को अपमानित महसूस करते हैं.

यह बिलकुल साफ है जजों की नियुक्ति में सरकार अपने बड़पप्पन बनाए रखना चाहती है जो नियुक्तियों के लिए बने कोलोजियम को मजूर नहीं है पर सरकार जिद में पुरानी व्यवस्थाओं को नजरंदाज कर रही है जो काफी घातक ट्रेंड है..

सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने अपने इरादे साफ कर दिए थे कि उसे जजों की नियुक्त का पुराना कॉलेजियम सिस्टम मंजूर नहीं है क्योंकि उसमे उसकी राय की कोई अहमियत नहीं होती.

मोदी सरकार ने कॉलेजियम की जगह राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्त आयोग बनाकर उसके जरिए जज तैनात किए जाएंगे और इस आयोग को कानूनी मान्यता देने के लिए सरकार ने बाकायदा संविधान संशोधन भी किया और एक अधिनियम भी लेकर आई जिसे राष्ट्रपति ने भी मंजूरी दे दी पर यह आयोग काम शुरु करता इसके पहले ही अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने इसे असंवैधानिक करार दे दिया.

इसके बाद तय हो गया कि जजों की नियुक्ति कॉलेजियम व्यवस्था के तहत ही होगी पर साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में यह भी कहा था कि कोलिजियम और सरकार मिलकर तैनाती के लिए एक  मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर तैयार करें.

इसके बाद सरकार थोड़ी हरकत में आई उसने इस मेमोरेंडम का एक मसौदा सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम को भेजा जिसमें यह प्रावधान था कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर किसी भी सुझाए गए नाम को खारिज कर सकती है और जजो का नाम तय करने में सरकारी महाधिवक्ताओं की भूमिका होगी पर ये दोनों बाते न्यायपालिका को मंजूर नहीं है.

आखिरकार इंतजार करने के बाद कॉलेजियम ने एक मसौदा मई 2017 मे सरकार को भेजा जिसे अब तक सरकार ने मजूर नहीं किया है.

इस खींचतान का ही नतीजा है कि कॉलेजियम द्वारा सुझाए गए  77 जजों के नाम में से सरकार ने पहली बार थोक भाव में  43 नाम खारिज कर दिए..

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सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के तहत कॉलेजियम द्वारा किसी नाम को अगर दोबारा सरकार के पास भेजा जाता है तो उसे स्वीकार करना सरकार की मजबूरी होती है और इस पर अब तक तो माना जाता रहा था पर इस सरकार ने कर्नाटक के  जिला एवं सत्र न्यायाधीश पी कृष्णा भट की उच्च न्यायालय में प्रोन्नति के मामले में इस परम्परा को भी ठेंगा दिखा दिया जिसके खिलाफ हाल ही मे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस चेलमेश्वर ने एक छह पन्नों का पत्र लिखकर सरकार के इस रुख पर पूर्ण कोर्ट में सुनवाई करने की मांग की है.

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