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बेरोजगारी के मोर्चे पर पूरी तरह फेल हुई मोदी सरकार

मौजूदा मोदी सरकार बेरोजगारी के मोर्चे पर बुरी तरह फेल साबित हुई है और देश में किसी भी तरह के काम की तलाश करते नौजवानों की संख्या आजाद भारत में इस समय सबसे ज्यादा हो चुकी है.

सरकार के छुपाने की कोशिशों के बावजूद नेशनल सैम्पल सर्वे को जो आंकड़े सामने आएं हैं उसमें बेरोजगारी की दर 45 साल में सबसे ज्यादा हो चुकी है और ये हालत तब है जब केंद्र और राज्य सरकारों स्वीकृत दसियों लाख पद खाली पड़े हुए हैं.

देश को इस खराब हालत में पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा बिना सोचे समझे की गई नोटबंदी  और बिना मुकम्मिल तैयारी के लागू की गई जीएसटी को सीधे जिम्मेदार माना जा रहा है जिसकी वजह से चल रहे तमाम उद्योग बंद हुए नए रोजगार के मौके सृजन होने के विपरीत उपलब्ध रोजगार भी घट गए.

शायद यही वजह है कि मोदी सरकार ने नेशनल सैम्पल सर्वे के बेरोजगारी के आंकड़ों को जारी करने पर रोक लगा दी थी जिसके विरोध में नेशनल सैम्पल सर्वे आफिस के दोनो गैर सरकारी सदस्यों पीसी मोहनन और जेवी मीनाक्षी ने  दो दिन पहले ही इस्तीफा दे दिया है जबकि उनका कार्यकाल जून 2020 तक था.

बेरोजगारी के लीक हुए आंकड़े बताते हैं कि  जुलाई 2017 से जून 2018 तक बेरोजगारी की सीमा 6.1 फीसदी पहुंच गई, जो 1972-73 के बाद सबसे ज्यादा है.

शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी  7.8 फीसदी है जबकि ग्रामीण इलाकों में  5.3 फीसदी है और
पिछले एक साल में नौकरियां मिलने की संख्या 1.1 करोड़ कम हुई है.

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