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बिन मांगे विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता यानि शिक्षा के बाजारीकरण का रास्ता साफ

बिन मांगे विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता यानि शिक्षा के बाजारीकरण का रास्ता साफ

मोदी सरकार ने साठ से ज्यादा विश्वविद्यलयो को बिन मांगे ही स्वायत्तता देकर न सिर्फ उच्च शिक्षा में सरकार का बोझ कम कर लिया है बल्कि इसके बाजारीकरण का रास्ता साफ कर दिया है.

सरकार के इस ऐलान के बाद शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों में इसके फायदे नुकसान को लेकर बहस गर्म है और ज्यादातर लोगों का मानना है कि इसके बाद विश्वविद्यालय नफे-नुकसान की व्यवस्था से चलेंगे और उन्हें खुली छूट होगी कि वो उन विषयों को पढ़ाएं जिनकी बाजार मे ज्यादा मांग हो और ज्यादा मांग वाले विषयों पर ज्यादा फीस लेने की आजादी तो सरकार उन्हे दे ही चुकी है.

यानि अब स्व वित्त पोषी कोर्स की बाढ़ हम आने वाले समय में देख सकते हैं जिसमे युवाओं को समाज की बेहतर इकाई के रूप में विकसित करने और हिन्दी, इतिहास जैसे तमाम विषय जिनकी बाजार में कोई खास मांग नहीं है पीछे छूट सकते हैं.

एक बार यह व्यवस्था बन गई तो इसका खामियाजा भी गरीब, दलितों और समाज के पिछड़े तबके के युवाओं को सबसे ज्यादा उठाना पड़ सकता है.

केंद्र सरकार के मानव विकास मंत्रालय ने बिन मांगे स्वायत्तता देने के फैसले के साथ जो गाइडलाइन तैयार की है उसमे विषय, फीस तय करने के साथ ही शिक्षकों का वेतन तक तय करने की आजादी विश्वविद्यालयों को हासिल हो जाएगी.

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