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चुनाव आयोग पर पहली बार इतने सवाल यानि अब शेषन जैसा कोई नहीं

चुनाव आयोग पर पहली बार इतने सवाल यानि अब शेषन जैसा कोई नहीं

चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर इस आम चुनाव मेंं जितने सवाल उठे हैं उतने तो शायद ही कभी ही उठे होंगे या यूं कहें कि एक निर्विवाद अम्पायर की तरह इस बार के चुनावी मैच को कराने में मौजूदा चुनाव आयोग बुरी तरह फेल सा नजर आ रहा.

शायद इसी का नतीजा है कि आज देश के सुप्रीम कोर्ट भी बाकायदा चुनाव आयोग को ये निर्देश देने पड़े कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ आचार संहिता उल्लंघन की जो भी शिकायतें हैं उन पर छह मई तक फैसला लिया जाए.

साफ है कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी प्रक्रिया में बिना सीधा हस्तक्षेप किए चुनाव आयोग से ही कहा कि वो अपनी क्षमता और विवेक के अनुसार सरकारी मशीनरी को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाले इन दोनों लोगों की शिकायतों पर फैसला ले.

अब आज का चुनाव आयोग प्रधानमंत्री के खिलाफ जाकर फैसला लेने की स्थिति में नहीं लगता यह आज उसके द्वारा पीएम की महाराष्ट्र के लातूर में दिए गए विवादित बयान को क्लीन चिट दिए जाने के तरीके से साफ है.

इस रैली में पीएम ने पहली बार वोट देने जा रहे युवाओं से अपील की थी कि उनका पहला वोट क्या क्या बालाकोट में हवाई हमला करने वालों और पुलवामा के शहीदों के लिए हो सकता है और ये बयान उन्होंने मंच से तब दिया था जब आयोग ने ही चुनाव प्रचार में सेना की उपलब्धियों का इस्तेमाल न करने के दिशा निर्देश जारी किए थे.

अब उनके इस भाषण पर विवाद हुआ तो महाराष्ट्र के चुनाव अधिकारियों ने उनके भाषण की स्क्रिप्ट के साथ चुनाव आयोग को रिपोर्ट भेजी कि पहली नजर में ये आचार संहिता के उल्लंघन का मामला लगता है पर इस रिपोर्ट पर बैठक करने के बाद चुनाव आयोग ने इस तर्क के साथ मोदी को क्लीन चिट दे दी कि उन्होंने रैली में कहीं खुद अपने लिए या अपनी पार्टी के लिए वोट नहीं मांगे.

आयोग का यह तर्क कितना हास्यास्पद है क्योंकि वो ये तो मान रहा है कि ये चुनाव रैली थी पर शायद उसकी परिभाषा में चुनाव रैली ऐसी भी हो सकती है जिसमें वोट न मांगे जाते हों … सब जानते हैं कि चुनाव रैली होती ही वोट मांगने के लिए हैं पर आयोग नहीं मानता.

इससे एक दिन पहले ही पीएम मोदी की बनारस सीट से जिस तरह सपा-बसपा के प्रत्याशी तेज बहादुर को नामांकन आयोग ने तकनीकी आधारों पर खारिज किया है वो भी उसकी कार्यशैली पर बड़ा सवाल उठा रहा है.

आयोग ने इस आधार पर उसका नामांकन खारिज किया है कि वो बीएसएफ का बर्खास्त कर्मचारी है पर कानूनन भ्रष्टाचार और देश के प्रति गद्दारी के आरोप में बर्खास्त व्यक्ति ही पांच साल तक चुनाव नहीं लड़ सकता है और तेज प्रताप ने अपनी बर्खास्तगी का जो पत्र नामांकन के साथ दाखिल किया है उसमें बीएसएफ ने ही उसे अनुशासनहीनता के आरोप में बर्खास्त करने की बात कही क्योंकि वो जवानों को खाने के लिए मिल रही पानी जैसी दाल और जली हुई रोटियों का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर ले गया था.

आश्चर्य की बात यह है कि इस सिपाही की मूल शिकायतों पर जांच नहीं हुई और अगर हुई तो उसकी क्या रिपोर्ट आई यह देश को नहीं बताया गया है पर उसका नामांकन जैसे तैसे खारिज किया गया जबकि उसकी बर्खास्तगी का मुकदमा अभी हाईकोर्ट में चल रहा है यानि बर्खास्तगी अभी भी विवादों में है.

इस बार हर दिन आचार संहिता के उल्लंघन के इतने मामले शायद इसीलिए आ रहें क्योंकि आयोग इस बार सभी को चुनाव लड़ने में एक समान माहौल नहीं दे पा रहा और इसीलिए आज के माहौल में पिछले चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को भी याद किया जाना चाहिए जिन्होंने आचार संहिता को इतनी सख्ती से लागू करवाया था कि धुरंधरों के भी पसीने छूट गए थए.

दरअसल चुनावी आचार संहिता कोई कानूनी बाध्यता नहीं और ये राजनीतिक दलों द्वारा ईमानदारी से चुनाव लड़ने के लिए सहमति से तय की गई व्यवस्था है, इसलिए अगर कोई दल इसे तोड़ने पर उतारू ही हो जाए तो बहुत कुछ किया भी नहीं जा सकता सिवाय निन्दा और आलोचना के और अगर यह भी किया जाए तो राजनीतिक दलों की साख पर असर पड़ता है जिससे वे डरते हैं.

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