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कोठों की मिट्टी से देवी की मूर्तियां बनाने का काम जोरों पर

कोठों की मिट्टी से देवी की मूर्तियां बनाने का काम जोरों पर

शरदीय नवरात्र  को लेकर  परम्परा के अनुसार  इस बार  भी  मूर्तिकार तवायफों के कोठों से  मिट्टी वाकर देवी  प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं.

 हालत यह है कि कोलकाता में जितनी भी मूर्तियां बन रही है शायद ही कोई होगी जिसकी अग्रिम बुकिंग दुर्गा मूर्ति समितियों  ने न की हो.

बंगाल  के कृष्णा नगर कोलकाता से आए मूर्तिकार शंकर पाल ने बताया कि उनकी तीन पीढ़ियां इस काम को करती आ रही हैं और वे स्वयं 13 साल की उम्र से मूर्ति बनाने का काम कर रहे हैं और हर  साल में 7-8 माह गणेश, विश्वकर्मा व दूर्गा की मूर्तियां बनाने के बाद गांव लौट जाते हैं.

उन्होंने बताया कि मूर्ति निर्माण में हसदेव नदी के किनारे की मिट्टी का उपयोग किया जा रहा है…मूर्ति में विशेष आभा के साथ चमक बढ़ाने के लिए बंगाल से विशेष प्रकार की दूध मिट्टी का उपयोग किया जाता है.

इसके अलावा परम्परानुरूप तवायफ के कोठे की मिट्टी भी वे साथ लेकर आते हैं जिसे प्रतिमा बनाने के लिए उपयोग की जाने वाली मिट्टी में मिलाया जाता है.

लेकिन महंगाई की मार इस ओर भी दिख रही है जिससे मूर्तियों के भाव में भी 20 फीसदी तक  का इजाफा हुआ है और अब बाजारों में मूर्तियां साढ़े चार हजार से तीस हजार रुपये तक में बिक रही हैं.

मूर्तिकार शंकर पाल ने बताया कि पहले के मुकाबले दूध मिट्टी 20 रुपये, मोती कलर तीन हजार रुपये व सामान्य कलर दो हजार 500 रुपये प्रति किलो मिल रहा है. साथ ही मिट्टी, बांस, पैरा के भाव और किराये में वृद्धि हुई है.

— आईएएनएस

 

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