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अब कोई रिश्ता नहीं रहा मोदी की लोकप्रियता और लाइलाज बेरोजगारी मे ….

अब कोई रिश्ता नहीं रहा मोदी की लोकप्रियता और लाइलाज बेरोजगारी मे ….

देश में बेरोजगारों की हर महीने नई फौज तैयार हो रही है और नया रोजगार जितना मिल रहा है उससे ज्यादा पुराने लोगों का रोजगार छिन रहा है फिर भी प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ कहीं से भी प्रभावित हो रहा हो इसके कोई संकेत नहीं है.

हर महीने 12 लाख लोगों के रोजगार बाजार में प्रवेश करने और रोजगार के मौके बढ़ने की बजाए लगातार घटते जाने से अब तो लगने लगा है कि मौजूदा सरकार के लिए बेरोजगारी अब लाइलाज बन चुकी है.

पिछले अगस्त माह में सेंटर फार मानीटरिंग इंडियन इकोनामी के अनुसार यह बढ़कर 8.2 फीसदी हो चुकी है जबकि पिछले साल इसी महीने में ये 6.2 फीसदी थी.

एक तरफ बेरोजगारों की बढ़ती फौज और दूसरी ओर आर्थिक मंदी से रोजगार के मौजूदा अवसरों के सिमिटते जाने ने स्थितियों को खासा डरावना बना दिया है.

अब तक जिन लाखों लोग बेरोजगार होकर फिर जाब मार्केट में पहुंच चुके हैं उनकी तो चर्चा करना ही बेईमानी है पर यह जानना जरूर काम का हो सकता है नौकरी जाने का खतरा अभी भी कितना कायम है.

आटो सेक्टर में देश में साढ़े तीन लाख का रोजगार जाने के बाद अब देश की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल बिस्कुट बनाने वाली कम्पनी पारलजी ने भी ऐलान किया है कि वो जल्दी ही दस हजार लोगों की छंटनी करने जा रही है.

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस कारपोरेट टैक्स को कम करके मोदी सरकार ने दावा किया है कि इससे आर्थिक मंदी खत्म हो जाएगी और कम्पनियां काम करेंगी तो लोगों को काम भी मिलेगा, क्या ये भी काम नहीं करने वाला.

आर्थिक जानकार कारपोरेट टैक्स घटाने के सरकारी ऐलान के इतने दिनों बाद कहने लगे हैं कि मोदी सरकार का यह क्रांतिकारी फैसला सिर्फ चल रही नौकरियों को बचाने भर में कारगर साबित हो सकता है पर इसकी वजह से रोजगार में कोई तूफान आ जाएगा इसकी उम्मीद दिवा स्वप्न ही होगी.

वैसे देश विदेश के आर्थिक मामलों के जानकार इस बात से भी इंकार नहीं कर पा रहे हैं कि जिस तरह रिजर्व बैंक का जमा रोकड़ा सरकार ने उससे लेकर बैंको को सौंप दिया है और बैंक रिफार्म के नाम पर बैंकों का विलय किया है उससे देश की अर्थ व्यवस्था पर दिखाने के लिए पैैच-वर्क जैसा काम तो हो सकता है पर इससे अगले बजट में जब वित्तीय घाटा बढ़ेगा तो बाहर से और कर्जा लेने के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा… तो क्या हम भी पाकिस्तान की तरह कटोरा लेकर घूमने जैसी हालत की ओर बढ़ रहे हैैं.

बहरहाल इन सबसे इतर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तरकस में अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए तमाम बाण है पहले शौचालय बनवाना, महिलाओं को गैस कनेक्शन बांटना और अब कश्मीर उनका ग्राफ अभी तो गिरने नहीं दे रहा खासकर तब जबकि हमारी एजेंसिया भी विपक्ष के एक से एक बड़े नेता को भ्रष्टाचार के आरोपों में खींचकर अदालत तक ला रही हों.

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