Thursday, July 27 2017
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थोपा राष्ट्रवादः तो फिर मंदिरों, मस्जिदों, नाइट-क्लबों में जन गण मन क्यों नहीं

 तो फिर मंदिरों, मस्जिदों, नाइट-क्लबों में जन गण मन क्यों नहीं

तो फिर मंदिरों, मस्जिदों, नाइट-क्लबों में जन गण मन क्यों नहीं

सिनेमाघरों में हर शो के पहले राष्ट्रगान बजाने के सुप्रीम कोर्ट के नए आदेशो ने देश के बुद्धिजीवियों में नई बहस को जन्म दे दिया है और अब यह सवाल पूछा जा रहा है कि आखिर मंदिरों,मस्जिदों, नाइट क्लबों और संसद और विधानसभाओं की हर बैठक के पहले राष्ट्रगान क्यों नहीं बजना चाहिए?

एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भले ही शीर्ष अदालत के इस आदेश का समर्थन किया हो पर देश में एक बड़ा तबका है जो इसे थोपा हुआ राष्ट्रवाद कहकर विरोध कर रहा है.

फिल्म निर्माता राम गोपाल वर्मा ने ट्विटर पर लिखा है कि क्यों नहीं अदालत यह भी आदेश जारी करती कि नाइट क्लबों और बार में पीने पिलाने और डांस का दौर शुरू होने के पहले राष्ट्रगान बजाया जाए.

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राम गोपाल वर्मा ने एक के बाद एक ट्वीट करके लिखा है कि शीर्ष अदालत अदालत को मंदिरों, मस्जिदों और चर्चों में प्रार्थना शुरू होने से पहले राष्ट्रगान अनिवार्य करना चाहिए.

एक और ट्वीट में उन्होंने लिखा है कि कितना अच्छा होता कि नोटबंदी का टीवी पर ऐलान करने से पहले नरेन्द्र मोदी राष्ट्रगान गाते तो फिल्म निर्माता शेखर कपूर ने लिखा है कि अगर छोटे बच्चे स्कूलों में राष्ट्रगान गा सकते हैं तो क्यों नहीं हमारे सांसद और विधायक ऐसा करते हैं, आखिर राष्ट्रभक्ति दिखाने की जरूरत उन्हें भी तो है.

ट्विटर पर तो इसे लेकर बहस सी छिड़ी है जिसमें एक व्यक्ति ने पोस्ट किया है कि अदालत ने गौ-रक्षकों के बाद राष्ट्रगान रक्षकों की नई सेना बनने का रास्ता खोल दिया है तो वरिष्ठ सम्पादक शेखर गुप्ता ने चिन्ता जाहिर की है कि आखिर इसे कैसे लागू किया जाएगा.. क्या हर हाल में एक सिपाही तैनात होगा और इस समय ही इस आदेश का औचित्य क्या है जब कई राज्यों में चुनाव होने है.

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