Thursday, July 27 2017
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आज भी महानतम् ठग है ताजमहल और सांसदों को बेचने वाला नटवरलाल

लोगो को शायद अब यह ध्यान भी नहीं होगा कि भारत के नटवर लाल को आज भी दुनिया के महानतम् ठग का रुतबा हासिल है जिसने न सिर्फ ताजमहल को तीन बार बेचा बल्कि देश की संसद का भी उसके सभी 545 सांसदों के साथ सौदा कर डाला था.

उसकी मौत के 17 साल बाद भी कोई नहीं जानता यह शातिर दिमाग लोंगो को भरोसे में कैसे ले लेता था, ठीक उसी तरह कि दुनिया यह भी नहीं जानती कि वह सच में मरा कब.

वह धोखाधड़ी का ऐसा उस्ताद था कि उसने अपने हर कारनामे को हर बार नए तरह से अंजाम दिया और इसके लिए उसने पचास से भी ज्यादा नामों का इस्तेमाल किया.

नटवर लाल जिसके दिमाग का पार पाना आसान नहीं

नटवर लाल जिसके दिमाग का पार पाना आसान नहीं

वह किसी लिविंग लीजेन्ड से कम नहीं था यह इसी से समझा जा सकता है कि अभिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म मिस्टर नटवर लाल जब बनी तो वह जिन्दा था पर यह नहीं पता कि उसने खुद यह फिल्म देखी थी या नहीं.

उसकी जालसाजी का शिकार होने वालो में टाटा,बिरला और धीरुभाई अम्बानी सरीखे बड़े उद्योगपति से लेकर सैकड़ों का संख्या में लोग शामिल हैं जिनसे उसने करोड़ो की ठगी की.

उसने तोजमहल तीन बार और लाल किला दो बार तो बेचा ही साथ ही राष्ट्रपति भवन और दिल्ली रेलवे स्टेशन तक बेच डाला और ताजुब यहकिहर बार उसे खरीददार भी मिल जाते थे.

हद तो तब हो गई जब उसने भारतीय संसद को सभी 545 सांसदों समेत बेच डाला और खरीदने वाले को जालसाजी का अंदाजा तब हुआ जब वह रकम लेकर फरार हो चुका था.

देश के आठ राज्यों में उसके खिलाफ 114 से ज्यादा मुकदमें दर्ज हुए जिनमें 14 नतीजे तक पहुंचे और उनमें उसे 117 साल की कुल सजा हुई पर कोई भी जेल उसे कभी बांधकर नहीं रख सकी.

पेशे से वकील रहे बिहार के सिवान जिले के निवासी मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव उर्फ नटवरलाल कुल नौ बार जेल से फरार हुए पर हर बार जेल भी नई रही और फरारी का तरीका भी नया.

आखिरी बार उसे 24 जून 1996 को दिल्ली स्टेशन पर देखा गया जब कानपुर से पुलिस उसका इलाज  दुनिया के दस महानतम् ठगों में उसने अपनी दावेदारी तब पेश की जब उसने  तीन बार ताजमहल तो<img src="http://morningflash.com/wp-content/uploads/2016/04/newsmakers-260x300.jpg" alt="नटवर लाल जिसके दिमाग का पार पाना आसान नहींकराने के लिए एम्स ले जा रही थी पर व्हील-चेयर पर बैठा चलने-फिरने में भी लाचार यह ठग पुलिस की आंखों में धूल झोंककर ऐसा फरार हुआ कि फिर खबी नजर नहीं आया.

उसकी मौत कब हुई इस पर भी विवाद है क्योंकि उसके भाई गंगा प्रसाद श्रीवास्तव का दावा है कि उसने उसकी अंत्येष्टि 1996 में रांची में की जबकि उसके वकील ने अदालत को उसकी 25 जुलाई 2009 को मौत होने की सूचना देते हुए उसके खिलाफ चल रहे करीब सौ मुकदमों को समाप्त करने की मांग की.

हालांकि गांव मे स्थित उसके मकान को और उसकी मूर्ति को नष्ट कर दिया गया था पर उसकी छवि तमाम लोगों के बीच आज भी राबिनहुड की है जो अमारों को लूटकर गरीबों की मदद करता था.

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